पर्यावरण बचाने के लिए 85 सालों से जला रहे हैं कंडों की होली, जानिए कंडों के अद्भुत फायदे

February 23, 2018
🚩भारत में 1 मार्च को होली मनाई जायेगी उस दिन शाम को करीब हर नगर, गांव में होलिका दहन होता ही है, अधिकतर जगहों पर होली लकड़ियों से जलाते हैं लेकिन उनको पता नही है कि लकड़ियों से होली जलाना कितना हानिकारक होता है वहीं दूसरी ओर गाय के गोबर के कंडों से होली जलाने से अनेक अद्भुत फायदे होते हैं, इसलिए आप इस बार से हर साल गाय के गोबर के कंडो से ही होली जलाये ।
Burning for 85 years to save the environment,
Holi of Kandon, know the wonderful benefits of cans
🚩आपको बता दें कि ग्वालियर में पर्यावरण को बचाने के लिए नागरिक प्राचीन काल से ही जागरूक हैं। ग्वालियर में पिछले 85 साल से कंडों की होली जलाई जा रही है। कंडों की होली जलाने से एक ओर जहां पर्यावरण सुरक्षित रह रहा है। साथ ही कंडों की होली जलाने से पशुपालकों को भी आर्थिक लाभ मिलता है, जिससे वह पशुओं का बेहतर ढंग से रखरखाव कर पाते हैं।
🚩ग्वालियर शहर में सबसे बड़ी होली सर्राफा बाजार में जलाई जाती है। इस होली में एक बार में 10 हजार से अधिक कंडों का उपयोग होता है।  35 साल पहले शुरू हुई इस पहल में जल्द ही पूरे सराफा बाजार के व्यापारी जुड़ गए। इसी प्रकार दौलतगंज में भी लगभग 85 साल पहले से कंडों की होली जलाई जाती है। इसी प्रकार एक सदी के लगभग अचलेश्वर महादेव पर भी कंडों की होली जलाई जा रही है। साथ ही दौलतगंज, नयाबाजार, लोहिया बाजार, दालबाजार आदि स्थानों पर भी होली में कंडों का उपयोग किया जाता है।
🚩गौरतलब है कि केवल ग्वालियर ही नही बल्कि देश के अनेक जगहों पर गोबर के कंडो से होली जलाई जाती है ।
🚩इंदौर के युवाओं की शानदार पहल
🚩मध्यप्रदेश इंदौर के युवाओं ने पिछले साल से गाय के गोबर के कंडो से होली जलाने की शुरुआत की थी ।
🚩इंदौर (मध्य प्रदेश) में छोटी-बड़ी करीब 20 हजार से ज्यादा होलियां जलती है, इस दिन यदि लकड़ियों के बजाय गोबर के कंडों की होली जलाई जाए तो शहर की 150 गौशालाओं में पल रही लगभग 50 हजार गाए अपना सालभर का खर्च खुद निकाल लेती हैं ।
🚩पिछले साल से इंदौर के 50 व्यापारियों और कारोबारियों ने मिलकर ऐसी पहल की है, जिसमें सीख बाद में, फायदे का सौदा पहले हैं । दो साल के ट्रायल में नफा-नुकसान को कसौटी पर परखने के बाद अब वे घर, बाजार, मंडी, दफ्तरों में जाकर इसका गणित समझा रहे हैं । मध्यप्रदेश गौपालन एवं पशुसंवर्धन बोर्ड ने भी इसे तकनीकी रूप से सही ठहराया है।
🚩कंडे और होली का बहीखाता
🚩इंदौर की 30 किमी की सीमा में छोटी-बड़ी 150 गौशालाएं हैं, जिनमें लगभग 50 हजार गाएं हैं। जबकि प्रदेश में अनुदान प्राप्त 664 गौशालाएं हैं। इनमें लगभग 1 लाख 20 हजार गाएं रहती हैं।
🚩एक गाय रोज 10 किलो गोबर देती है। इस तरह इंदौर सहित प्रदेशभर में रोज 12 लाख किलो गोबर निकलता है। 10 किलो गोबर को सुखाकर 5 कंडे बनाए जा सकते हैं।
🚩होली पर इंदौर में 15-20 लाख कंडों की जरूरत होती है, जिसके पर्याप्त इंतजाम हैं।
🚩गोबर से गाय अपना खर्च कैसे निकालेगी?
🚩शुरू से अभियान से जुड़े कारोबारी मनोज तिवारी, राजेश गुप्ता और गोपाल अग्रवाल ने पिछले साल बताया था कि एक कंडे की कीमत 10 रुपए है। इसमें 2 रुपए कंडे बनाने वाले को, 2 रुपए ट्रांसपोर्टर को और 6 रुपए गौशाला को मिलेंगे। यदि शहर में होली पर 20 लाख कंडे भी जलाए जाते हैं तो 2 करोड़ रुपए कमाए जा सकते हैं। औसतन एक गौशाला के हिस्से में बगैर किसी अनुदान के 13 लाख रुपए तक आ जाएंगे। लकड़ी की तुलना में लोगों को कंडे सस्ते भी पड़ेंगे। गौ सेवा से जुड़े अखिल भारतीय गो सेवा प्रमुख शंकरलाल जी ने कहा था कि यह अभियान कोलकाता के कुछ हिस्सों में शुरू हुआ था, लेकिन बड़े पैमाने पर हो तो इसका व्यापक असर देखा जा सकता है।
🚩आपको बता दें कि केवल 2 किलो सूखा गोबर जलाने से 300 ग्राम ऑक्सीजन निकलती है । #एक गाय रोज 10 किलो गोबर देती है। इसकी राख से 60 फीसदी यानी 300 ग्राम ऑक्सीजन निकलती है। वैज्ञानिकों ने शोध किया है कि गाय के एक कंडे में गाय का घी डालकर धुंआ करते हैं तो एक टन ऑक्सीजन बनता है ।
🚩कंडे की होली और गोबर खाद खरीदकर समाज में गौशालाओं को स्वाबलंबी बनाया जा सकता है।
🚩गौमाता हमारे लिए कितनी उपयोगी है जानने के लिए नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करें ।
🚩भारत में प्रतिदिन लगभग 50 हजार गायें बड़ी बेरहमी से काटी जा रही हैं । 1947 में गोवंश की जहाँ 60 नस्लें थी, वहीं आज उनकी संख्या घटकर 33 ही रह गयी है । हमारी अर्थव्यवस्था का आधार गाय है और जब तक यह बात हमारी समझ में नहीं आयेगी तबतक भारत की गरीबी मिटनेवाली नहीं है । गोमांस विक्रय जैसे जघन्य पाप के द्वारा दरिद्रता हटेगी नहीं बल्कि बढ़ती चली जायेगी । गौवध को रोकें और गोपालन कर #गोमूत्ररूपी विषरहित कीटनाशक तथा दुग्ध का प्रयोग करें । गोवंश का संवर्धन कर देश को मजबूत करें । #भारतीय गायों के मूत्र में पूरी दुनियाँ की गायों से ज्यादा रोगप्रतिरोधक शक्ति है । ब्राजील और मेक्सिको में भारत के गोवंशों को आदर्श माना जाता है । वे भारतीय गोवंश का आयात कर इनसे लाभान्वित हो रहे हैं ।
🚩आपने देखा कि केवल गौ माता के गोबर से ही गौ-पालन हो जाता है और #गाय के #दूध एवं #मूत्र  में #सुवर्णक्षार पाएं गये हैं जो मनुष्य के #स्वास्थ्य में चार चांद लगा देते हैं ।
🚩अगर परम उपयोगी #गौ-माता का पालन #सरकार नही करती तो आप ही करें ,औरों को भी प्रेरित करें एवं ग्वालियर और  इंदौर के युवाओं की तरह आप भी अपने गाँव-नगर में कंडो से ही होली जलाएं ।
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बाबा रामदेव की खुल गई पोल, अपने को अवतार सिद्ध करने के लिए बनाई झूठी सीरियल

February 22, 2018
🚩बाबा रामदेव की अभी हाल ही में टीवी सीरियल रिलीज हुई है लेकिन हिन्दू संगठन, ब्राह्मण, अहीर, यादव उनसे काफी नाराज होकर तरह तरह का विरोध कर रहे हैं, यहाँ तक बोल दिया है कि स्वदेशी के नाम पर बाबा रामदेव विदेशी शक्तियों से मिलकर हिन्दुओं को जाति में बांटने के लिये यह सीरियल बनाई गई है यहाँ कई हिंदुओं ने तो प्रण लिया है कि जब तक सीरियल बेन नही होगी तब तक हम पतंजलि का सामान नही खरीदेंगे ।
Baba Ramdev’s open pole, false serial made to prove his avatar
🚩रामदेव एक पाखंड कथा
🚩रामदेव (राम किशन )के जीवन पर बनी एक टीवी सीरियल रामदेव एक संघर्ष झूठ का पुलिंदा है जिसमें सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए रामदेव ने न सिर्फ ब्राह्मणों पर निशाना साधा है बल्कि यादवों के कुल को भी कलंकित किया है। रामदेव के गांव में दौरा करके डॉ ईश्वर सिंह यादव ने सच्चाई जानने की कोशिश तो आश्चर्यजनक सत्य सामने आया कि सीरियल में रामदेव सिर्फ झूठ बोल रहे हैं और पाखंड कर रहे हैं, जबकि सच्चाई कुछ और है।
🚩दिनांक 18 फरवरी 2018 के दिन इस षडयंत्र की सत्यता जानने के लिए अहीरवाल के भाईचारे के हिमाती व समाजसेवियों का एक दल रामदेव की जन्मभूमि व पैतृक गाँव “अली सैदपुर” गया और लोगों से मिलकर सच्चाई जानने हेतु तफ्तीश की। इस दल में आर्य समाज के सन्यासी 88 वर्षीय स्वामी हरीश मुनि जी खवासपुर , प्रख्यात समाजसेवी राधेश्याम गोमला जी, फौजी रामफूल राव जी बास पदम का, नौजवान पियूष अहीर जी बुडीन शामिल थे। जो हैरतअंगेज सच्चाई सामने आई वो आप के समक्ष पेश है —
🚩1. सबसे पहले गाँव का निरिक्षण किया और पाया कि गाँव खुशहाल है, हाँ गाँव में खेती-लायक पानी की जरुर कमी है। गाँव अहीरवाल क्षेत्र यानि अहीर बाहुल्य क्षेत्र का हिस्सा है। रामदेव के दादा पूसा जी गाँव में “बोहरा जी” यानी “धनाढ्य” कहलाते थे और उनके बुजुर्ग किसी दौर में गाँव की कुल खेतिहर ज़मीन के करीब चौथाई हिस्से के मालिक थे। यानि रामदेव का परिवार पैतृक रूप से बड़े बिस्वेदार/जमींदार थे और इनके परिवार का बहुत सम्मान था।
🚩2. गाँव में रामदेव के परिवार के ही बुजुर्ग जगदीश आर्य जी ने अपने पिता राव उमराव सिंह जी की याद में एक बहुत ही शानदार धर्मशाला सन 1972 में बनवाई थी जिससे रामदेव के परिवार की खुशहाली का पता चलता है।
🚩3. एक ग्रामीण के मुताबिक किसी दौर में इनका कुटुम्ब इतना बड़ा था कि परिवार में घर के बाहर जूती ही जूतियाँ दिखाई देती थी , यानी इस परिवार के पास बहुत बड़ा संख्या बल था और ऐसे बड़े और धनाढ्य परिवार को गाँव में कोई दबा नहीं सकता।
🚩4. रामदेव ने 8वी. कक्षा तक पढाई यहीं रहकर करी और फिर इनके बड़े जगदीश जी आर्य ने इनका दाखिला गुरुकुल खानपुर(अहीरवाल) में करवा दिया जहाँ इनके गुरु थे आचार्य प्रद्युम्न ,जखराना वाले, जो समस्त हिन्द में संस्कृत व्याकरण के सबसे बड़े विद्वान् थे और जाति से राव साहब यानि यादव थे और आचार्य जी आज भी पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में ही रहते हैं । तो इसका मतलब गुरुकुल में भी इनके साथ कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ।
🚩5. खानपुर गुरुकुल के बाद रामदेव की शिक्षा कालवा गुरुकुल में हुई जहाँ शिक्षक आचार्य बलदेवजी थे जो खुद एक पिछड़े कृषक समुदाय से आते थे ,इसलिए कालवा गुरुकुल में भी रामदेव पर किसी भी प्रकार के भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं थी।
🚩6. शिक्षा के बाद इनके मुख्य रूप से दो साथी थे, आचार्य बालकृष्ण जो ब्राह्मण हैं और आजतक इनके साथ हैं तथा दूसरे आचार्य कर्मवीर।
🚩7. गाँव में इनके अग्रज देवदत्त जी मिले जो CRPF से रिटायर्ड हैं और इनका मकान गाँव का सबसे आलिशान महलनुमा मकान है और खेती के लिए इनके पास एक ट्यूबवेल भी है , यानि हर तरह से सम्पन्न। जब उनसे चर्चा हुई तो वे बोले कि सीरियल में काफी बातें सत्य से परे हैं।
🚩8. गाँव में कभी एक मंगतू ब्राह्मण का परिवार था जिसकों यहाँ यादवों ने करीब 30 बीघा ज़मीन दान देकर बसाया था जिसके एक पुत्र हुआ मांगू ब्राह्मण जिसके सिर्फ एक पुत्री थी जिसके पति निरंजनलाल को यहाँ बसाया गया ,जिसकी संतानें आज भी गाँव में हैं और बड़े सरल स्वभाव का परिवार है। ब्राह्मणों में कोई भी “गोरधन महाराज” नाम का व्यक्ति कभी पैदा ही नहीं हुआ ,यानी सारा टीवी सीरियल सिर्फ एक कपोल-गाथा है। कभी जिस ब्राह्मण परिवार को अहीरों ने बसाया हो वो कैसे अपने सहारा देने वालों पर कोई भेदभाव/ज़ुल्म कर सकता है या जो यादवों पर कभी आश्रित रहा हो वो कभी इतनी हिमाकत कर सकता है?
🚩9. गाँव के कई यादव बुजुर्गों जिनकी आयु 80-90 वर्ष रही होगी उनसे मिले , उन्होंने बताया कि उनके जीवन-काल में कभी भी गाँव में कृष्ण-लीला/रामलीला आदि का मंचन नहीं हुआ। रामदेव का जन्म तो 1973 में हुआ ,फिर टीवी सीरियल में ये कृष्ण-लीला का मंचन एक कोरा झूठ साबित होता है।
🚩10. गाँव के बुजुर्गों और रामदेव के भाई व् कुटुम्ब के लोगों ने बताया कि रामदेव का परिवार तो इतना सबल था कि किसकी हिम्मत थी कि उनको गाँव से बाहर निकालते ? टीवी सीरियल के इस झूठ का भी पर्दाफाश हुआ।
🚩11. रामदेव के बड़े भाई देवदत्त ने खुद बताया कि उनको कभी पंचायत के सामने बाँध कर कोई भी किसी तरह की सामाजिक सज़ा नहीं दी गयी और न ही उनके माँ-बाप को।
🚩12. जब हमने रामदेव के बड़े भाई देवदत्त से पूछा कि रामदेव ने टीवी सीरियल में झूठ क्यों दर्शाया तो वो बोले कि “बिना तडके वाली दाल” कौन खायेगा ? इसमें “तड़का” नहीं होगा तो फिर कौन देखेगा ? यानी सिर्फ टीवी सीरियल की पब्लिसिटी के लिए झूठ का सहारा लिया जाएगा और यादवों के स्वाभिमान से खिलवाड़ किया गया। गाँव के कुछ लोग ये बोले कि इस सीरियल से गाँव और समाज की बदनामी हुई है और अब कौन यादव हमारे गाँव में अपने बच्चों का रिश्ता करेगा ?
🚩13. गाँव में आज करीब 300 घरों की बस्ती है और 40 साल पहले शायद इससे भी कम घर होंगे। बुजुर्गों ने बताया कि उनके जीवन-काल में कभी भी गाँव में कोई हाट-बाज़ार नहीं लगा। आज भी बस एक-आध ही छोटी सी कोई दुकान हैं। फिर टीवी सीरियल में ये दिखाया गया कि रामदेव और उनकी माता का दुकानदारों ने सामान देने से इंकार कर दिया और कृष्ण-मुकुट नहीं खरीदने दिया ,ये कौन से युग में हुआ ? इस कोरे झूठ का भी पर्दाफाश हुआ।
🚩14. आज गाँव में गिनती के ट्यूबवेल हैं और एक रामदेव के बड़े भाई के पास है। अखबार में छपी ये खबर भी गलत साबित हुई कि अगर उनके मटके से पानी ज़मीन पर छलक जाता था तो पहले उस रस्ते को धोया जाता था। खुद उनके भाई और परिवार ने इस झूठ का खंडन किया। जिस गाँव में करीब 80-90 % यादव परिवार हों और खेडा भी यादवों का ही बसाया गया हो ,तो गाँव के सब रास्तों पर यादवों की ही सबसे ज्यादा आवाजाही रहती है ,फिर ऐसा कैसे हो सकता था ? इस झूठ का भी ग्रामीणों ने पर्दाफाश किया।
🚩15. गाँव में ग्रामीणों और इनके कुटम्ब के लोगों से मिलने पर ये सच्चाई ज्ञात हुई —
🚩(i) गाँव में कोई कृष्ण-मूर्ति या मंदिर नहीं है अपितु एक ठाकुर द्वारा हैं जहाँ गाँव की समस्त जातियाँ बड़े प्रेम से पूजा-अर्चना करती हैं।
🚩(ii) गाँव में किसी भी तरह की जातिगत दुर्भावना नहीं है बल्कि सब जातियां बड़ी समरसता से रहती हैं।
🚩(iii) गाँव बिछवालिया गोत्र के राव साहबों का ठिकाना है यहाँ के ब्राह्मण/कुम्हारों/स्वामी आदि जातियों में बहुत भाईचारा है और ब्याह-शादी आदि पर्वों को सब आपस में एक दूसरे के साथ मनाते हैं । यहाँ के यादव सरदार इतने दानवीर हैं कि अभी हाल ही में एक गरीब कुम्हार की बेटी की शादी में समस्त ग्रामीणों ने खूब दान दिया और गाँव की बेटी को बड़े प्रेम और ठाट-बाट से विदा किया। यानी गाँव खुशहाल है और भाईचारे की मिसाल है। ये ही हाल आस-पास के यादवों के गांवों का है क्योंकि ये अहीरवाल यानी अहीर बाहुल्य क्षेत्र का ही हिस्सा है
🚩अहीरवाल पर यादव राजवंश का राज रहा है। सामंत/ज़मींदार भी यादव थे और आज भी ये यादव राजकुल मौजूद है। अहीरवाल क्षेत्र का बहुत ऐतिहासिक क्षत्रिय इतिहास रहा है। यहाँ के लोग देश व राष्ट्र-रक्षा के लिए तैमुर के खिलाफ लड़े, नादिरशाह के खिलाफ लड़े, अंग्रेजों के खिलाफ नसीबपुर में एक बहुत ही बहादुराना लडाई लड़ी। आधुनिक इतिहास में रेजांगला में वीरता की सबसे बड़ी शौर्यगाथा लिखी, हाजीपीर, जैसलमेर मोर्चा, टाइगर हिल आदि हर लडाई में यहाँ के यदुवंशी मौजूद थे। यहाँ घर-घर में फौजी हैं और ये यादवों का पुश्तैनी कार्य भी रहा है। सैद अलीपुर गाँव में भी बहुत फौजी है, खुद रामदेव के परिवार के कप्तान रोहताश सिंह साहब भी सेना में थे। यानी जिस कौम का इतना शानदार जंगी-इतिहास रहा हो उस पर कोई कैसे ज़ुल्म कर सकता है?
🚩इस टीवी सीरियल के ज़रिये अहीरवाल के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने की कोशिश है और सिर्फ व्यवसायिक फायदे के लिए विभिन्न वर्गों में विष फ़ैलाने की कोशिश है। रामदेव का परिवार बड़ा बिस्वेदार और धनाढ्य रहा है ,लेकिन झूठी सहानभूति के लिए कपोल-गाथा गढ़ी गयी। जिस परिवार ने गाँव में 1972 में बड़ी धर्मशाला का निर्माण किया, बड़ी ज़मीनों के मालिक हैं वो परिवार कभी तिरस्कार का कैसे भागी रहा होगा ? जिस यादव कौम का शानदार जंगी-इतिहास रहा हो, जिसने अहीरवाल पर राज़ किया हो वो कैसे इस कपोल-गाथा का हिस्सा हो सकती है?
🚩आज रामदेव के पास इज्ज़त, पैसा,नाम,सम्मान आदि सब कुछ है, फिर ये कैसे झूठ का भागीदार हो गया ? सन्यासी का पहला धर्म है कि सत्य की स्थापना करे और असत्य का खण्डन , फिर ये सन्यास-धर्म से कैसे विमुख हो गया ? खुद को एक अवतार घोषित करने के लोभ में रामदेव ने यादव जैसी मर्द कौम की गरिमा को ही दाँव पर लगा दिया है जिसका हर यदुवंशी को पुरजोर विरोध करना चाहिए। – डॉक्टर ईश्वर सिंह यादव
🚩जनता ने बताया कि बाबा रामदेव से अनुरोध है समय रहते चेत जाएं। नहीं तो जहर उगलती काल्पनिक व मार्मिक कहानियां बनानी हमें भी आती हैं।
🚩अब इतने विरोध के बाद देखते हैं कि स्वदेशी के नाम से प्रोडक्ट बेचकर जातिवाद पर हिन्दुओं को विभाजित करने वाली टीवी सीरियल पर बेन लगती है या नही।
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होली पर केमिकल रंगों से खेलने से होगी भयंकर हानि, जानिए अपने घर में कैसे बनायें प्राकृतिक रंग

February 21, 2018

🚩 होली का त्यौहार पूरे देश में बड़े #उत्साह से मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना, समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है ।
Playing with the colors of Holi will be a terrible loss,
know how to make a natural color in your home
🚩 मीडिया सूखे रंगों से होली खेलने की सलाह देती है लेकिन सूखे #केमिकल #रंगों से होली खेलने की सलाह देनेवाले लोग वस्तुस्थिति से अनभिज्ञ हैं । क्योंकि #डॉक्टरों का कहना है कि सूखे रासायनिक रंगों से होली खेलने से शुष्कता, एलर्जी एवं #रोमकूपों में #रसायन अधिक समय तक पड़े रहने से भयंकर त्वचा रोगों का सामना करना पड़ता है ।
🚩 प्राकृतिक रंगों से होली खेले बिना जो लोग ग्रीष्म ऋतु बिताते हैं, उन्हें गर्मीजन्य उत्तेजना, चिड़चिड़ापन, खिन्नता, मानसिक अवसाद (डिप्रेशन), तनाव, अनिद्रा इत्यादि तकलीफों का सामना करना पड़ता है ।
🚩 आइये आपको बताते है प्राकृतिक रंग कैसे बनायें ?
🚩1- केसरिया रंग : #पलाश के फूलों को रात को पानी में भिगो दें । सुबह इस #केसरिया रंग को ऐसे ही प्रयोग में लायें या उबालकर, उसे ठंडा करके #होली का आनंद उठायें ।
🚩लाल रंग : #पान पर लगाया जानेवाला एक चुटकी चूना और दो चम्मच हल्दी को आधा प्याला पानी में मिला लें । कम-से-कम 10 लीटर पानी में घोलने के बाद ही उपयोग करें ।
🚩सूखा पीला रंग : 4 चम्मच बेसन में 2 चम्मच हल्दी चूर्ण मिलायें । सुगंधयुक्त कस्तूरी #हल्दी का भी उपयोग किया जा सकता है और बेसन की जगह गेहूँ का आटा, चावल का आटा, आरारोट का चूर्ण, मुलतानी मिट्टी आदि उपयोग में ले सकते हैं ।
🚩गीला पीला रंग : (1) एक चम्मच हल्दी दो लीटर पानी में उबालें या मिठाइयों में पड़नेवाले रंग जो खाने के काम में आते हैं, उसका भी उपयोग कर सकते हैं। (2) अमलतास या गेंदे के फूलों को रात को पानी में भिगोकर रखें, सुबह उबालें।
🚩 पलाश के फूलों का रंग बनायें । पलाश के फूलों से बने रंगों से होली खेलने से शरीर में गर्मी सहन करने की क्षमता बढ़ती है, मानसिक संतुलन बना रहता है ।

 

🚩रासायनिक रंगों से होने वाली हानि…
🚩1 – काले #रंग
में लेड ऑक्साइड
पड़ता है जो
गुर्दे की बीमारी, दिमाग की कमजोरी
करता है ।
🚩2 – हरे रंग में कॉपर सल्फेट होता है जो आँखों में जलन, सूजन, अस्थायी अंधत्व
लाता है ।
🚩3 – सिल्वर रंग में #एल्यूमीनियम ब्रोमाइड होता है जो कैंसर करता है ।
🚩4- नीले रंग में प्रूशियन ब्ल (कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस) से भयंकर #त्वचारोग
होता है ।
🚩5 – लाल रंग जिसमें मरक्युरी सल्फाइड
होता है जिससे त्वचा का #कैंसर होता है ।
🚩6- बैंगनी रंग में  क्रोमियम आयोडाइड
 होता है जिससे दमा, #एलर्जी
होती है । (यह लेख #संत #आसारामजी आश्रम से प्रकाशित ऋषि प्रसाद से लिया गया है)
🚩त्वचा विशेषज्ञ #डॉ. आनंद कृष्णा कहते हैं कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सारा साल हम जो त्वचा और बालों का ध्यान रखते हैं वह होली के अवसर पर भूल जाते हैं और केमिकल रंगों से इनको भारी नुकसान पहुँचाते हैं ।
🚩दैनिक भास्कर की तो मुर्खानी की हद हो गई जो कई सालों से केवल तिलक होली खेलने का प्रचलन कर रहा है ।
🚩भास्कर को पता नही है कि जिन #ऋषि मुनियों ने #होली #त्यौहार बनाया है वो हमारे उत्तम स्वास्थ्य और शरीर में छुपे हुए रोगों को मिटाने के लिए बनाया है ।
🚩केमिकल रंगों से होली खेलने के बाद भी बहुत अधिक पानी खर्च करना पडता है । एक-दो बार खूब पानी से नहाना पड़ता है क्योंकि रासायनिक रंग जल्दी नहीं धुलते । प्राकृतिक रंग जल्दी ही धुल जाते हैं ।
🚩प्राकृतिक रंगो से होली खेलने से पानी की अधिक खपत का प्रलाप करने वाली #मीडिया को #शराब, #कोल्डड्रिंक्स, #गौहत्या के लिए हररोज बरबाद किया जा रहा #करोड़ों #लीटर पानी क्यों नही दिखता…???
🚩महाराष्ट्र के नेता विनोद तावडे ने सबूतों के साथ पानी के आँकड़े पेश किये जिसमें #शराब बनाने वाली #कम्पनियां #अरबो लीटर #पानी की #बर्बादी करती हैं ।
🚩‘डीएनए न्यूज’ की रिपोर्ट के अनुसार 1 लीटर कोल्डड्रिंक बनाने में 55 लीटर पानी बरबाद होता है ।
🚩कत्लखाने में 1 किलो #गोमांस के लिए #15,000 लीटर पानी बरबाद होता है । #कोल्डड्रिंक्स और शराब के कारखानों में मशीनरी और बोतलें धोने में तथा बनाने की प्रक्रिया में #करोड़ों लीटर पानी बरबाद होता है ।
🚩बड़े-बड़े #होटलों में आलीशान #स्विमिंग टैंक्स के लिए लाखों लीटर पानी की सप्लाई बेहिचक की जाती है।
🚩हकीकत यह होते हुए भी मीडिया द्वारा कभी इसका विरोध नही किया गया ।
🚩‘प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ के अनुसार #रासायनिक रंगों से होली खेलना अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना है ।
🚩डॉ. #फ्रांसिन पिंटो के अनुसार रासायनिक रंगों से होली खेलने के बाद उन्हें धोने के लिए प्रति व्यक्ति 35 से 500 लीटर तक पानी खर्च करता है ।
🚩यह केमिकल युक्त पानी पर्यावरण के लिए घातक है । #घर भी रंगों से खराब हो जाते हैं । उन्हें धोने में कम-से-कम 100 लीटर पानी बरबाद हो जाता है ।
🚩 अतः आप इस बार वैदिक होली मनाकर स्वयं को स्वस्थ रखें। प्राकृतिक रंगों से होली खेले, केमिकल रंगों से बचे । ऋषि-मुनियों द्वारा बनाया गया यह त्यौहार जरूर मनायें, जिससे आपका स्वास्थ्य भी बढ़िया रहे और गर्मी में आने वाले रोगों से भी रक्षा हो ।
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संयुक्त अरब में बनेगा हिन्दू मन्दिर, ऑस्ट्रेलिया में भी सबसे तेजी से बढ़ रहा है हिन्दुत्व

February 20, 2018
ईसाई धर्म की स्थापना यीशु ने 2017 साल पहले की, मुस्लिम धर्म की स्थापना 1450 साल पहले मोहम्मद पैंगम्बर ने की लेकिन हिन्दू धर्म की किसी ने स्थापना नही की है बल्कि जबसे सृष्टि का उद्द्गम हुआ तबसे हिन्दू (सनातन ) धर्म है, सनातन धर्म में ही भगवान श्री राम, श्री कृष्ण और ऋषि-मुनियों का अवतार हुआ और उन्होंने धर्म का प्रचार प्रसार करके मनुष्य को इतना उन्नत करने की कला बताई कि वो स्वयं नई सृष्टि बना सकता है।
दुनिया का सबसे प्राचीन हिन्दू धर्म अपनी उदारता, व्यापकता और सहिष्णुता की वजह से पूरी दुनिया के लोगों को ध्यान खींच रहा है। ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड जैसे देश में तो सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म बन गया है।
Hindu temple will be built in the United Arab world,
Australia is also fastest growing Hindutva
ऑस्ट्रेलिया में हिन्दुत्व के सबसे तेजी से बढते धर्म के उभरने के साथ ही विक्टोरिया सरकार ने यहां श्री शिव विष्णु मंदिर के उन्नयन के लिए शुक्रवार को 160,000 डॉलर की धनराशि देने की घोषणा की । कल्चर एंड हेरिटेज सेंटर को श्री शिव विष्णु मंदिर के तौर पर भी जाना जाता है । इसे वर्ष 1994 में मंदिर का दर्जा दिया गया था । इसे दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे बडा हिन्दू मंदिर भी माना जाता है । विक्टोरिया में बहुसंस्कृति मामलों के मंत्री रोबिन स्कॉट ने शुक्रवार (16 फरवरी) को मंदिर की यात्रा करते हुए कहा कि सरकार हिन्दू सोसाइटी ऑफ विक्टोरिया को 160,000 डॉलर से ज्यादा की धनराशि कल्चरल एंड हैरिटेज सेंटर के उन्नयन के लिए देगी ।
स्कॉट ने कहा कि श्री शिव विष्णु मंदिर के उन्नयन से हमारे हिन्दू समुदाय को करुणा, निस्वार्थता, सद्भाव, सहिष्णुता और सम्मान के मूल्यों को स्थापित करने तथा साझा करने में मदद मिलेगी ।
आपको बता दें कि ऑस्ट्रेलिया में 2011 की जनगणना के अनुसार हिंदू धर्म सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म है। 2011 की जनगणना में हिंदू धर्म सर्वाधिक तेजी से फैलने वाला धर्म पाया गया था। 2016 की जनगणना में 2.7 फीसद हिंदू आबादी का अनुमान है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में आधुनिकता की दौड़, भागमभाग, तनाव में लिपटी जीवनचर्या को हिंदू धर्म में ही सुकून मिल रहा है।
दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म के प्रति ऑस्ट्रेलियाई लोगों में आस्था बढ़ रही है। हिन्दू धर्म अपनाने वाले एक ऑस्ट्रेलियाई के अनुसार हिंदू धर्म में जीवन जीने का तरीका, शाकाहार, कर्म, आध्यात्मिकता ऐसे तत्व हैं जो और कहीं नहीं हैं।
ऑस्ट्रेलिया के #मेलबर्न जैसे बड़े शहर में #रथयात्रा और #जन्माष्टमी जैसे #त्यौहारों के मौकों पर मंदिरों में और अन्य आयोजनों में उमड़ती हजारों लोगों की भीड़ से #हिंदुत्व के प्रति ऑस्ट्रेलियाई लोगों की #आस्था का अंदाजा लगाया जा सकता है।
मेलबर्न में इस्कॉन मंदिर के अलावा भी कई मंदिर हैं जो आस्था का केंद्र बने हुए हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पूरे #ऑस्ट्रेलिया में भगवान #गणेश, #श्रीकृष्ण, #माता दुर्गा, #हनुमान जी  के 51 #हिंदू मंदिर हैं। इनमें से 19 मंदिर विक्टोरिया में हैं। मेलबर्न के कैरम डाउन इलाके में शिव-विष्णु मंदिर ऑस्ट्रेलिया का सबसे पुराना और बड़ा मंदिर है। इसकी बुनियाद 1988 में रखी गई थी। ये मंदिर करीब 6 एकड़ में फैला है और यहां हर साल लाखों लोग दर्शन के लिए आते हैं।
इन मंदिरों में हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी, नामकरण संस्कार और पूजा-अर्चना के अलावा होली-दीवाली जैसे मौकों पर खास आयोजन भी किए जाते हैं। लोग बच्चे के जन्म, नए घर में प्रवेश या कार खरीदने पर भी यहां पूजा के लिए आते हैं।
इसाई देश आयरलैंड में बढ़ रहे है हिन्दू
आयरलैंड देश मुख्य रूप से ईसाई धर्म का पालन करने वाला देश है। लेकिन आयरलैंड
में भी हिन्दू धर्म का तेजी से विकास हो रहा है। आयरलैंड की जनगणना के अनुसार पिछले 5 सालों में हिन्दुओं की आबादी में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह जनगणना 2016 के अप्रैल महीने में की गयी थी।
संयुक्त अरब में बनेगा भव्य हिन्दू मंदिर
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की राजधानी अबू धाबी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीते रविवार (11 फरवरी) को वीडियो लिंकिंग के जरिए  हिन्दू मंदिर की आधारशिला रखी थी । अबू धाबी में भारतीय मूल के तीस लाख से ज्यादा लोग रहते हैं । मंदिर समिति के सदस्यों ने मंदिर से जुडा साहित्य प्रधानमंत्री मोदी को शनिवार (10 फरवरी) रात यहां पहुंचने पर दिया । दुबई-अबू धाबी राजमार्ग पर बनने वाला यह अबू धाबी का पहले पत्थर से निर्मित मंदिर होगा । अबू धाबी में प्रथम हिन्दू मंदिर 55,000 वर्ग मीटर भूमि पर बनेगा ।
एक तरफ विदेशी भी हिन्दू धर्म की महिमा जानकर हिन्दू धर्म और संस्कृति की तरफ आकर्षित हो रहे है, दूसरी ओर हिन्दू बाहुल देश भारत में ही ईसाई मिशनरियां और कुछ मुस्लिम समुदाय के लोग हिन्दू धर्म को मिटाकर अपना धर्म बढ़ाना चाहते हैं इसलिए लालच देकर एवं जबरन धर्मान्तरण,  लव जिहाद आदि करके हिन्दू धर्म को तोड़ रहे हैं ।
हिन्दू धर्म में रहने वाले भी कुछ लोग हिन्दू धर्म की महिमा समझते नही हैं और बोलते हैं कि सर्व धर्म समान । सकरव धर्म सम्मान तो हो सकता है पर सर्व धर्म समान नहीं हो सकते ।  महान सनातन हिन्दू धर्म को किसी धर्म के साथ जोड़ना मूर्खता ही है।
हिन्दू संस्कृति की आदर्श #आचार #संहिता ने समस्त वसुधा को #आध्यात्मिक एवं #भौतिक उन्नति से पूर्ण किया, जिसे हिन्दुत्व के नाम से जाना जाता है।
हिन्दू धर्म का यह पूरा वर्णन नही हैं इससे भी कई गुणा ज्यादा महिमा है क्योंकि हिन्दू धर्म सनातन धर्म है इसके बारे में संसार की कोई कलम पूरा वर्णन नही कर सकती । आखिर में हिन्दू धर्म का श्लोक लिखकर विराम देते हैं ।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।
ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः

हिन्दुओं, सावधान! मीडिया आपके खिलाफ चलाने वाली है कैम्पियन, आप क्या कर सकते है पढ़े

February 19, 2018
सभी जानते हैं कि अधिकतर इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया हिन्दुओं व उनके त्यौहारों के खिलाफ है, हिन्दुओं के खिलाफ मतलब केवल एक हिन्दू के खिलाफ नही बल्कि उनकी जहां-जहां आस्था है उसी केंद्र बिंदु को तोड़ने के लिए विदेशी ताकतों के इशारे पर काम कर रही है ।
विदेशी फंडेड मीडिया हाउस का टारगेट मुख्यरूप से हिन्दू देवी-देवता, हिन्दू त्यौहार, हिन्दू साधु-संत, वैदिक गुरुकुलों, मन्दिर, आश्रम आदि आदि हैं ।
Hindus, be careful! The media is going to run against you,
the champion, what you can read
आपको बता दें कि अभी होली आने वाली है हर बार की तरह इस बार भी मीडिया में 24 घंटे डिबेट चलने की संभावना है कि होली दहन लकड़ियों से करने पर वातावरण प्रदूषित होगा, धुलेंडी खेलने पर पानी का बिगाड़ होगा आदि ।
 हमारे ऋषि-मुनियों ने जो भी त्यौहार बनाये उनके पीछे कई वैज्ञानिक तथ्य छुपे मिले ।
होली दहन के पीछे का वैज्ञानिक कारण :  होली के दिनों में ऋतु परिवर्तन होता है तो शरीर में कफ पिघलकर जठराग्नि में आता है जिसके कारण अनेक बीमारियां होती है उससे बचने के लिए होली दहन की तपन से कफ जल्दी पिघल कर नष्ट हो जाता है और दूसरे दिन कूद-फांद कर धुलेंडी खेलने से कफ निकल जाता है जिसके कारण अनेक भयंकर बीमारियों से रक्षा होती है ।
प्राचीनकाल में होली का दहन गाय के गोबर के कण्डों से किया जाता था जिसमें से ऑक्सीजन निकलता था और धुलेंडी पलाश (केसूड़े) के फूलों के रंग से खेली जाती थी जिससे आने वाले दिनों में गर्मी के कारण होने वाले रोगों से बचाव हो जाता था ।
आजकल जिन लकड़ियों से होली दहन किया जाता है वैसे नही करना चाहिए उसके बदले गाय के गोबर के कण्डों से करना चाहिए ।
गोबर से कण्डों से होली जलाने के फायदे
एक गाय करीब रोज 10 किलो गोबर देती है। 10..
 किलो गोबर को सुखाकर 5 कंडे बनाए जा सकते हैं।
एक कंडे की कीमत 10 रुपए रख सकते हैं। इसमें 2 रुपए कंडे बनाने वाले को, 2 रुपए ट्रांसपोर्टर को और 6 रुपए गौशाला को मिल सकते है । यदि किसी एक शहर में होली पर 20 लाख कंडे भी जलाए जाते हैं तो 2 करोड़ रुपए कमाए जा सकते हैं। औसतन एक गौशाला के हिस्से में बगैर किसी अनुदान के 13 लाख रुपए तक आ जाएंगे। लकड़ी की तुलना में लोगों को कंडे सस्ते भी पड़ेंगे।
केवल 2 किलो सूखा गोबर जलाने से 60 फीसदी यानी 300 ग्राम ऑक्सीजन निकलती है । वैज्ञानिकों ने शोध किया है कि गाय के एक कंडे में गाय का घी डालकर धुंआ करते है तो एक टन ऑक्सीजन बनता है ।
गाय के गोबर के कण्डों से होली जलाने पर गौशालाओं को स्वाबलंबी बनाया जा सकता है, जिससे गौहत्या कम हो सकती है, कंडे बनाने वाले गरीबों को रोजी-रोटी मिलेगी, और वतावरण में शुद्धि होने से हर व्यक्ति स्वस्थ्य रहेगा ।
पलाश रंग से धुलेंडी खेलने के फायदे
पलाश के फूलों से होली खेलने की परम्परा का फायदा बताते हुए हिन्दू संत आशारामजी बापू कहते हैं कि ‘‘पलाश कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है। साथ ही रक्तसंचार में वृद्धि करता है एवं मांसपेशियों का स्वास्थ्य, मानसिक शक्ति व संकल्पशक्ति को बढ़ाता है।
रासायनिक रंगों से होली खेलने में प्रति व्यक्ति लगभग 35 से 300 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली में प्रति व्यक्ति लगभग 30 से 60 मि.ली. से कम पानी लगता है ।
इस प्रकार देश की जल-सम्पदा की हजारों गुना बचत होती है । पलाश के फूलों का रंग बनाने के लिए उन्हें इकट्ठे करनेवाले #आदिवासियों को #रोजी-रोटी मिल जाती है ।
पलाश के फूलों से बने रंगों से होली खेलने से शरीर में गर्मी सहन करने की क्षमता बढ़ती है, मानसिक संतुलन बना रहता है ।
तो आओ मनाएं ऐसा त्यौहार जिससे महके घर आंगन और स्वस्थ रहे परिवार..

जानिए वीर शिवाजी का इतिहास, कैसे शत्रुओं को चटाई थी धूल और की थी देश की रक्षा

February 18, 2018
🚩 छत्रपति वीर शिवाजी जयंती – 19 फरवरी
🚩शाहजी भोंसले की पत्नी जीजाबाई (राजमाता जिजाऊ) की कोख से #शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को #शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। शिवनेरी का दुर्ग पूना (पुणे) से उत्तर की तरफ जुन्नर नगर के पास था। उनका बचपन उनकी #माता #जिजाऊ के मार्गदर्शन में बीता। वह सभी कलाओं में माहिर थे, उन्होंने बचपन में राजनीति एवं युद्ध की शिक्षा ली थी। ये भोंसले उपजाति के थे जो कि मूलतः कुर्मी जाति के थे, उनके पिता अप्रतिम शूरवीर थे और उनकी दूसरी पत्नी तुकाबाई मोहिते थी । उनकी माता जी #जीजाबाई जाधव कुल में उत्पन्न असाधारण प्रतिभाशाली थी और उनके पिता एक शक्तिशाली सामंत थे। शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओं को भली प्रकार समझने लगे थे। शासक वर्ग की करतूतों पर वे झल्लाते थे और बेचैन हो जाते थे। उनके बाल-हृदय में स्वाधीनता की लौ प्रज्ज्वलित हो गयी थी। उन्होंने कुछ स्वामिभक्त साथियों का संगठन किया। अवस्था बढ़ने के साथ #विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ फेंकने का उनका संकल्प प्रबलतर होता गया। #छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन् 14 मई 1640  में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल, पुना में हुआ था।

Know the history of Veer Shivaji,
how the enemies were mat dust and had the country’s defense

 

🚩सैनिक वर्चस्व का आरंभ!!
🚩उस समय बीजापुर का राज्य आपसी संघर्ष तथा विदेशी आक्रमणकाल के दौर से गुजर रहा था। ऐसे #साम्राज्य के सुल्तान की सेवा करने के बदले उन्होंने मावलों को बीजापुर के खिलाफ संगठित किया। मावल प्रदेश पश्चिम घाट से जुड़ा है और लगभग 150 किलोमीटर लम्बा और 30 किलोमीटर चौड़ा है। वे संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करने के कारण कुशल योद्धा माने जाते हैं। इस प्रदेश में #मराठा और सभी जाति के लोग रहते हैं। शिवाजी महाराज ने इन सभी जाति के लोगों को लेकर मावलों (मावळा) नाम देकर सभी को संगठित किया और उनसे सम्पर्क कर उनके प्रदेश से परिचित हो गए थे। मावल युवकों को लाकर उन्होंने दुर्ग निर्माण का कार्य आरंभ कर दिया था। मावलों का सहयोग शिवाजी महाराज के लिए बाद में उतना ही महत्वपूर्ण साबित हुआ जितना शेरशाह सूरी के लिए अफगानों का साथ।
🚩उस समय #बीजापुर आपसी संघर्ष तथा #मुगलों के आक्रमण से परेशान था। बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने बहुत से दुर्गों से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों या सामन्तों के हाथ सौंप दिया था। जब आदिलशाह बीमार पड़ा तो बीजापुर में अराजकता फैल गई और शिवाजी महाराज ने अवसर का लाभ उठाकर बीजापुर में प्रवेश का निर्णय लिया। शिवाजी महाराज ने इसके बाद के दिनों में बीजापुर के दुर्गों पर अधिकार करने की नीति अपनाई। सबसे पहला दुर्ग था तोरण का दुर्ग।
🚩दुर्गों पर नियंत्रण!!
🚩तोरण का दुर्ग पूना के दक्षिण पश्चिम में 30 किलोमीटर की दूरी पर था। शिवाजी ने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना दूत भेजकर खबर भिजवाई की वे पहले किलेदार की तुलना में बेहतर रकम देने को तैयार हैं और यह क्षेत्र उन्हें सौंप दिया जाये। उन्होंने आदिलशाह के दरबारियों को पहले ही रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया था और अपने दरबारियों की सलाह के मुताबिक आदिलशाह ने शिवाजी महाराज को उस #दुर्ग का अधिपति बना दिया। उस दुर्ग में मिली सम्पत्ति से शिवाजी महाराज ने दुर्ग की सुरक्षात्मक कमियों की मरम्मत का काम करवाया। इससे कोई 10 किलोमीटर दूर राजगढ़ का दुर्ग था और शिवाजी महाराज ने इस दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया।
🚩शिवाजी महाराज की इस साम्राज्य विस्तार की नीति की भनक जब आदिलशाह को मिली तो वह क्षुब्ध हुआ। उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने को कहा। शिवाजी महाराज ने अपने पिता की परवाह किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया और नियमित लगान बन्द कर दिया।
🚩राजगढ़ के बाद उन्होंने चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और उसके बाद कोंडना के दुर्ग पर। #कोंडना (कोन्ढाणा) पर अधिकार करते समय उन्हें घूस देनी पड़ी। कोंडना पर अधिकार करने के बाद उसका नाम सिंहगढ़ रखा गया। #शाहजी राजे को पूना और सूपा की जागीरदारी दी गई थी और सूपा का दुर्ग उनके सम्बंधी बाजी मोहिते के हाथ में था। शिवाजी महाराज ने रात के समय सूपा के दुर्ग पर आक्रमण करके दुर्ग पर अधिकार कर लिया और बाजी मोहिते को शाहजी राजे के पास कर्नाटक भेज दिया। उसकी सेना का कुछ भाग भी शिवाजी महाराज की सेवा में आ गया। इसी समय पुरन्दर के किलेदार की मृत्यु हो गई और किले के उत्तराधिकार के लिए उसके तीनों बेटों में लड़ाई छिड़ गई। दो भाइयों के निमंत्रण पर शिवाजी महाराज पुरन्दर पहुँचे और कूटनीति का सहारा लेते हुए उन्होंने सभी भाइयों को बन्दी बना लिया। इस तरह पुरन्दर के किले पर भी उनका अधिकार स्थापित हो गया। अब तक की घटना में शिवाजी महाराज को कोई युद्ध या खूनखराबा नहीं करना पड़ा था। 1647 ईस्वी तक वे चाकन से लेकर नीरा तक के भूभाग के भी अधिपति बन चुके थे। अपनी बढ़ी सैनिक शक्ति के साथ शिवाजी महाराज ने मैदानी इलाकों में प्रवेश करने की योजना बनाई।
🚩एक अश्वारोही सेना का गठन कर शिवाजी महाराज ने आबाजी सोन्देर के नेतृत्व में कोंकण के विरुद्ध एक सेना भेजी। आबाजी ने कोंकण सहित नौ अन्य दुर्गों पर अधिकार कर लिया। इसके अलावा ताला, मोस्माला और रायटी के दुर्ग भी शिवाजी महाराज के अधीन आ गए थे। लूट की सारी #सम्पत्ति रायगढ़ में सुरक्षित रखी गई। कल्याण के गवर्नर को मुक्त कर शिवाजी महाराज ने कोलाबा की ओर रुख किया और यहाँ के प्रमुखों को विदेशियों के खिलाफ युद्ध के लिए उकसाया।
🚩शाहजी की बन्दी और युद्ध!!
🚩बीजापुर का सुल्तान #शिवाजी महाराज की हरकतों से पहले ही आक्रोश में था। उसने शिवाजी महाराज के पिता को बन्दी बनाने का आदेश दे दिया। शाहजी राजे उस समय कर्नाटक में थे और एक विश्वासघाती सहायक बाजी घोरपड़े द्वारा बन्दी बनाकर बीजापुर लाए गए। उन पर यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने कुतुबशाह की सेवा प्राप्त करने की कोशिश की थी जो गोलकोंडा का शासक था और इस कारण आदिलशाह का शत्रु। बीजापुर के दो सरदारों की मध्यस्थता के बाद शाहाजी महाराज को इस शर्त पर मुक्त किया गया कि वे शिवाजी महाराज पर लगाम कसेंगे। अगले चार वर्षों तक शिवाजी महाराज ने बीजीपुर के खिलाफ कोई आक्रमण नहीं किया। इस दौरान उन्होंने अपनी सेना संगठित की।
🚩प्रभुता का विस्तार!!
🚩शाहजी की मुक्ति की शर्तों के मुताबिक शिवाजी राजेने बीजापुर के क्षेत्रों पर आक्रमण तो नहीं किया पर उन्होंने दक्षिण-पश्चिम में अपनी शक्ति बढ़ाने की चेष्टा की। पर इस क्रम में जावली का राज्य बाधा का काम कर रहा था। यह राज्य सातारा के सुदूर उत्तर पश्चिम में वामा और कृष्णा नदी के बीच में स्थित था। यहाँ का राजा चन्द्रराव मोरे था जिसने ये जागीर शिवाजी से प्राप्त की थी। शिवाजी ने मोरे शासक चन्द्रराव को स्वराज में शमिल होने को कहा पर चन्द्रराव बीजापुर के सुल्तान के साथ मिल गया। सन् 1653 में शिवाजी ने अपनी सेना लेकर जावली पर आक्रमण कर दिया। चन्द्रराव मोरे और उसके दोनों पुत्रों ने शिवाजी के साथ लड़ाई की पर अन्त में वे बन्दी बना लिए गए पर चन्द्रराव भाग गया। स्थानीय लोगों ने शिवाजी के इस कृत्य का विरोध किया पर वे विद्रोह को कुचलने में सफल रहे। इससे शिवाजी को उस दुर्ग में संग्रहीत आठ वंशों की सम्पत्ति मिल गई। इसके अलावा कई मावल सैनिक मुरारबाजी #देशपाडे भी शिवाजी की #सेना में सम्मिलित हो गए।
🚩मुगलों से पहली मुठभेड़!!
🚩शिवाजी के बीजापुर तथा मुगल दोनों शत्रु थे। उस समय शहजादा औरंगजेब दक्कन का सूबेदार था। इसी समय 1 नवम्बर 16653 को बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की मृत्यु हो गई जिसके बाद बीजापुर में अराजकता का माहौल पैदा हो गया। इस स्थिति का लाभ उठाकर औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया और #शिवाजी ने औरंगजेब का साथ देने की बजाय उसपर धावा बोल दिया। उनकी सेना ने जुन्नार नगर पर आक्रमण कर ढेर सारी सम्पत्ति के साथ 200 घोड़े लूट लिये। #अहमदनगर से 700 घोड़े, चार हाथी के अलावा उन्होंने गुण्डा तथा रेसिन के दुर्ग पर भी लूटपाट मचाई। इसके परिणामस्वरूप औरंगजेब शिवाजी से खफा हो गया और मैत्री वार्ता समाप्त हो गई। शाहजहाँ के आदेश पर औरंगजेब ने बीजापुर के साथ संधि कर ली और इसी समय शाहजहाँ बीमार पड़ गया। उसके व्याधिग्रस्त होते ही औरंगजेब उत्तर भारत चला गया और वहाँ शाहजहाँ को कैद करने के बाद मुगल साम्राज्य का शाह बन गया।
🚩कोंकण पर अधिकार!!
🚩दक्षिण भारत में औरंगजेब की अनुपस्थिति और बीजापुर की डवाँडोल #राजनैतिक स्थिति को जानकर शिवाजी ने समरजी को जंजीरा पर आक्रमण करने को कहा। पर जंजीरा के सिद्दियों के साथ उनकी लड़ाई कई दिनों तक चली। इसके बाद शिवाजी ने खुद जंजीरा पर आक्रमण किया और दक्षिण कोंकण पर अधिकार कर लिया और दमन के पुर्तगालियों से वार्षिक कर एकत्र किया। कल्याण तथा भिवण्डी पर अधिकार करने के बाद वहाँ नौसैनिक अड्डा बना लिया। इस समय तक शिवाजी 40 दुर्गों के मालिक बन चुके थे।
🚩बीजापुर से संघर्ष!!
🚩इधर औरंगजेब के आगरा (उत्तर की ओर) लौट जाने के बाद बीजापुर के सुल्तान ने भी राहत की सांस ली। अब शिवाजी ही बीजापुर के सबसे प्रबल शत्रु रह गए थे। शाहजी को पहले ही अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने को कहा गया था पर शाहजी ने इसमें अपनी असमर्थता जाहिर की। शिवाजी से निपटने के लिए बीजापुर के सुल्तान ने अब्दुल्लाह भटारी (अफजल खाँ) को शिवाजी के विरूद्ध भेजा। अफजल ने 120000 सैनिकों के साथ 1659 में कूच किया। तुलजापुर के मन्दिरों को नष्ट करता हुआ वह सतारा के 30 किलोमीटर उत्तर वाई, शिरवल के नजदीक तक आ गया। पर शिवाजी प्रतापगढ़ के दुर्ग पर ही रहे। अफजल खाँ ने अपने दूत कृष्णजी भास्कर को सन्धि-वार्ता के लिए भेजा। उसने उसके मार्फत ये संदेश भिजवाया कि अगर शिवाजी बीजापुर की अधीनता स्वीकार कर ले तो सुल्तान उसे उन सभी क्षेत्रों का अधिकार दे देंगे जो शिवाजी के नियंत्रण में हैं। साथ ही शिवाजी को बीजापुर के दरबार में एक सम्मानित पद प्राप्त होगा। हालांकि शिवाजी के मंत्री और सलाहकार अस संधि के पक्ष मे थे पर शिवाजी को ये वार्ता रास नहीं आई। उन्होंने कृष्णजी भास्कर को उचित सम्मान देकर अपने दरबार में रख लिया और अपने दूत गोपीनाथ को वस्तुस्थिति का जायजा लेने अफजल खाँ के पास भेजा। #गोपीनाथ और कृष्णजी भास्कर से शिवाजी को ऐसा लगा कि सन्धि का षडयंत्र रचकर अफजल खाँ शिवाजी को बन्दी बनाना चाहता है। अतः उन्होंने #युद्ध के बदले अफजल खाँ को एक बहुमूल्य उपहार भेजा और इस तरह अफजल खाँ को सन्धि वार्ता के लिए राजी किया। सन्धि स्थल पर दोनों ने अपने सैनिक चौकन्ने कर रखे थे मिलने के स्थान पर जब दोनों मिले तब अफजल खाँ ने अपने कट्यार से शिवाजी पे वार किया बचाव में #शिवाजी ने #अफजल खाँ को 10 नबम्बर 1659 मे अपने वस्त्रों वाघनखो से #मार दिया ।
🚩अफजल खाँ की मृत्यु के बाद शिवाजी ने पन्हाला के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद पवनगढ़ और वसंतगढ़ के दुर्गों पर अधिकार करने के साथ ही साथ उन्होंने रूस्तम खाँ के आक्रमण को विफल भी किया। इससे राजापुर तथा दावुल पर भी उनका कब्जा हो गया। अब बीजापुर में आतंक का माहौल पैदा हो गया और वहाँ के सामन्तों ने आपसी मतभेद भुलाकर शिवाजी पर #आक्रमण करने का निश्चय किया। 2 अक्टूबर 1665 को बीजापुरी सेना ने पन्हाला दुर्ग पर अधिकार कर लिया। शिवाजी संकट में फंस चुके थे पर रात्रि के अंधकार का लाभ उठाकर वे भागने में सफल रहे। बीजापुर के सुल्तान ने स्वयं कमान सम्हालकर पन्हाला, पवनगढ़ पर अपना अधिकार वापस ले लिया, राजापुर को लूट लिया और श्रृंगारगढ़ के प्रधान को मार डाला। इसी समय कर्नाटक में सिद्दीजौहर के विद्रोह के कारण बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के साथ समझौता कर लिया। इस संधि में शिवाजी के पिता शाहजी ने मध्यस्थता का काम किया। सन् 1662 में हुई इस सन्धि के अनुसार शिवाजी को बीजापुर के सुल्तान द्वारा स्वतंत्र शासक की मान्यता मिली। इसी संधि के अनुसार उत्तर में कल्याण से लेकर दक्षिण में पोण्डा तक (250 किलोमीटर) का और पूर्व में इन्दापुर से लेकर पश्चिम में दावुल तक (150 किलोमीटर) का भूभाग शिवाजी के नियंत्रण में आ गया। #शिवाजी की #सेना में इस समय तक 30000 पैदल और 1000 घुड़सवार हो गए थे।
🚩मुगलों से संघर्ष!!
🚩उत्तर #भारत में बादशाह बनने की होड़ खत्म होने के बाद औरंगजेब का ध्यान दक्षिण की तरफ गया। वो शिवाजी की बढ़ती प्रभुता से परिचित था और उसने शिवाजी पर नियंत्रण रखने के उद्येश्य से अपने मामा शाइस्ता खाँ को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया। शाइस्का खाँ अपने 1,50,000 फौज लेकर सूपन और चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर पूना पहुँच गया। उसने 3 साल तक मावल में लूटपाट की। एक रात शिवाजी ने अपने 350 मावलों के साथ उनपर हमला कर दिया। शाइस्ता तो खिड़की के रास्ते बच निकलने में कामयाब रहा पर उसे इसी क्रम में अपनी चार अंगुलियों से हाथ धोना पड़ा। शाइस्ता खाँ के पुत्र, तथा चालीस रक्षकों और अनगिनत सैनिकों का कत्ल कर दिया गया। इस घटना के बाद औरंगजेब ने शाइस्ता को दक्कन के बदले बंगाल का सूबेदार बना दिया और शाहजादा मुअज्जम शाइस्ता की जगह लेने भेजा गया।
सूरत में लूट!!
🚩इस जीत से शिवाजी की #प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। 6 साल शास्ताखान अपनी 1,50,000 फौज लेकर राजा शिवाजी का पूरा मुलुख जलाकर तबाह कर दिया था। इस लिए उसका हर्जाना वसूल करने के लिये शिवाजी ने मुगल क्षेत्रों में लूटपाट मचाना आरंभ किया। #सूरत उस समय पश्चिमी व्यापारियों का गढ़ था और हिन्दुस्तानी मुसलमानों के लिए हज पर जाने का द्वार। यह एक समृद्ध नगर था और इसका बंदरगाह बहुत महत्वपूर्ण था। शिवाजी ने चार हजार की सेना के साथ छः दिनों तक सूरत के धनाढ्य व्यापारियों को लूटा आम आदमी को नहीं लूटा और फिर लौट गए। इस घटना का जिक्र डच तथा अंग्रेजों ने अपने लेखों में किया है। उस समय तक यूरोपीय व्यापारी भारत तथा अन्य एशियाई देशों में बस गये थे। नादिर शाह के भारत पर आक्रमण करने तक (1739) किसी भी यूूरोपीय शक्ति ने भारतीय मुगल साम्राज्य पर आक्रमण करने की नहीं सोची थी।
🚩सूरत में शिवाजी की लूट से खिन्न होकर औरंगजेब ने इनायत खाँ के स्थान पर गयासुद्दीन खां को सूरत का फौजदार नियुक्त किया और शहजादा मुअज्जम तथा उपसेनापति राजा जसवंत सिंह की जगह दिलेर खाँ और राजा जयसिंह की नियुक्ति की गई। राजा जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान, यूरोपीय शक्तियाँ तथा छोटे सामन्तों का सहयोग लेकर शिवाजी पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में शिवाजी को हानि होने लगी और हार की सम्भावना को देखते हुए शिवाजी ने सन्धि का प्रस्ताव भेजा। जून 1665 में हुई इस सन्धि के मुताबिक शिवाजी 23 दुर्ग मुगलों को दे देंगे और इस तरह उनके पास केवल 12 दुर्ग बच जाएंगे। इन 23 दुर्गों से होने वाली आमदनी 4 लाख हूण सालाना थी। बालाघाट और कोंकण के क्षेत्र शिवाजी को मिलेंगे पर उन्हें इसके बदले में 13 किस्तों में 40 लाख हूण अदा करने होंगे। इसके अलावा प्रतिवर्ष 5 लाख हूण का राजस्व भी वे देंगे। शिवाजी स्वयं औरंगजेब के दरबार में होने से मुक्त रहेंगे पर उनके पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार में खिदमत करनी होगी। बीजापुर के खिलाफ शिवाजी मुगलों का साथ देंगे।
🚩आगरा में आमंत्रण और पलायन
🚩शिवाजी को आगरा बुलाया गया जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। इसके खिलाफ उन्होंने अपना रोश भरे दरबार में दिखाया और औरंगजेब पर विश्वासघात का आरोप लगाया। औरंगजेब इससे क्षुब्ध हुआ और उसने शिवाजी को नजरकैद कर दिया और उनपर 5000 सैनिकों के पहरे लगा दिये। कुछ ही दिनों बाद (18 अगस्त 1666 को) राजा शिवाजी को मार डालने का इरादा औरंगजेब का था। लेकिन अपने अजोड़ साहस और  युक्ति के साथ #शिवाजी और सम्भाजी दोनों 17 अगस्त 1666 में वहां से भागने में सफल रहे ।
🚩#सम्भाजी को मथुरा में एक विश्वासी ब्राह्मण के यहाँ छोड़ शिवाजी बनारस, गया, पुरी होते हुए 2 सितंबर 1666 को सकुशल राजगढ़ पहुँच गए । इससे #मराठों को नवजीवन सा मिल गया। औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा डाली। जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार संधि की। औरंगजेब ने #शिवाजी को #राजा की मान्यता दी। शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को पूना, चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया पर सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुगलों का अधिपत्य बना रहा। सन् 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा। नगर से 132 लाख की सम्पत्ति शिवाजी के हाथ लगी और लौटते वक्त उन्होंने मुगल सेना को सूरत के पास फिर से हराया।
🚩राज्याभिषेक!!
🚩सन् 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरन्दर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे। पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र #हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु ब्राह्मणों ने उनका घोर विरोध किया। (संदर्भ दिजीए) शिवाजी के निजी सचिव बालाजी आव जी ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और उन्होंने काशी में गंगाभ नामक ब्राह्मण के पास तीन दूतों को भेजा, किन्तु गंगा ने प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि शिवाजी क्षत्रिय नहीं थे उसने कहा कि क्षत्रियता का प्रमाण लाओ तभी वह राज्याभिषेक करेगा। बालाजी आव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड के सिसोदिया वंश से समबंद्ध के प्रमाण भेजे जिससे संतुष्ट होकर वह रायगढ़ आया ओर उसने राज्याभिषेक किया। #राज्याभिषेक के बाद भी पूना के ब्राह्मणों ने शिवाजी को राजा मानने से मना कर दिया विवश होकर शिवाजी को अष्टप्रधान मंडल की स्थापना करनी पड़ी । विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया। शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि ग्रहण की। काशी के पण्डित विशेश्वर जी भट्ट को इसमें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। पर उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया। इस कारण से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ। दो बार हुए इस समारोह में लगभग 50 लाख रुपये खर्च हुए। इस #समारोह में हिन्दू स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था। विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था। एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने कोंकण विजय के लिए अपने दो सेनाधीशों को शिवाजी के विरुद्ध भेजा पर वे असफल रहे।
🚩दक्षिण में दिग्विजय!!
🚩सन् 1677-78 में शिवाजी का ध्यान कर्नाटक की ओर गया। उन्होंने #बम्बई के दक्षिण में कोंकण, तुंगभद्रा नदी के पश्चिम में बेलगाँव तथा धारवाड़ का क्षेत्र, मैसूर, वैलारी, त्रिचूर तथा जिंजी पर अधिकार जमाया।
🚩स्वर्गवास (मृत्यु) और उत्तराधिकार!!
🚩तीन सप्ताह की बीमारी के बाद शिवाजी का स्वर्गवास 3 अप्रैल 1680 में हुआ। उस समय शिवाजी के उत्तराधिकार शम्भाजी को मिला ।
छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा चलाया गया सिक्का!
🚩शिवाजी को एक कुशल और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाना जाता है। यद्यपि उनको अपने बचपन में पारम्परिक शिक्षा कुछ खास नहीं मिली थी, पर वे भारतीय इतिहास और राजनीति से सुपरिचित थे। उन्होंने #शुक्राचार्य तथा #कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति का सहारा लेना कई बार उचित समझा था। अपने समकालीन मुगलों की तरह वह भी निरंकुश शासक थे, अर्थात शासन की समूची बागडोर राजा के हाथ में ही थी। पर उनके प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद थी जिन्हें अष्टप्रधान कहा जाता था। इसमें मंत्रियों के प्रधान को #पेशवा कहते थे जो राजा के बाद सबसे प्रमुख हस्ती होते थे । अमात्य वित्त और राजस्व के कार्यों को देखता था तो मंत्री राजा की व्यक्तिगत दैनन्दिनी का ख्याल रखता था। सचिव दफतरी काम करते थे जिसमें शाही मुहर लगाना और सन्धि पत्रों का आलेख तैयार करना शामिल होते थे। सुमन्त विदेश मंत्री था। सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे। दान और धार्मिक मामलों के प्रमुख को पण्डितराव कहते थे। न्यायाधीश न्यायिक मामलों का प्रधान था।
🚩मराठा साम्राज्य तीन या चार विभागों में विभक्त था। प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार था जिसे प्रान्तपति कहा जाता था। हरेक सूबेदार के पास भी एक अष्टप्रधान समिति होती थी। कुछ प्रान्त केवल करदाता थे और प्रशासन के मामले में स्वतंत्र। न्यायव्यवस्था प्राचीन पद्धति पर आधारित थी।
🚩शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिन्दू धर्मशास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था। गाँव के पटेल फौजदारी मुकदमों की जाँच करते थे। राज्य की आय का साधन भूमिकर था पर चौथ और सरदेशमुखी से भी राजस्व वसूला जाता था। ‘चौथ’ पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा की गारंटी के लिए वसूले जाने वाला कर था। #शिवाजी अपने को मराठों का सरदेशमुख कहते थे और इसी हैसियत से सरदेशमुखी कर वसूला जाता था।
🚩राज्याभिषेक के बाद उन्होंने अपने एक #मंत्री (रामचन्द्र अमात्य) को शासकीय उपयोग में आने वाले फारसी शब्दों के लिये उपयुक्त #संस्कृत शब्द निर्मित करने का कार्य सौंपा। रामचन्द्र अमात्य ने धुन्धिराज नामक विद्वान की सहायता से ‘राज्यव्यवहारकोश’ नामक ग्रन्थ निर्मित किया। इस कोश में 1280 फारसी के प्रशासनिक शब्दों के तुल्य संस्कृत शब्द थे। इसमें #रामचन्द्र ने लिखा है- कृते म्लेच्छोच्छेदे भुवि निरवशेषं रविकुला-वतंसेनात्यर्थं यवनवचनैर्लुप्तसरणीम्।नृपव्याहारार्थं स तु विबुधभाषां वितनितुम्।नियुक्तोऽभूद्विद्वान्नृपवर शिवच्छत्रपतिना ॥८१॥
🚩धार्मिक नीति!!
🚩शिवाजी एक समर्पित हिन्दू थे तथा वह धार्मिक सहिष्णु भी थे। उनके साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी। कई मस्जिदों के निर्माण के लिए शिवाजी ने अनुदान दिया। हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान फकीरों को भी सम्मान प्राप्त था। उनकी सेना में मुसलमान सैनिक भी थे। #शिवाजी हिन्दू संकृति को बढ़ावा देते थे। पारम्परिक हिन्दू मूल्यों तथा शिक्षा पर बल दिया जाता था। वह अपने अभियानों का आरंभ भी अकसर दशहरे के अवसर पर करते थे।
🚩चरित्र
🚩शिवाजी महाराज को अपने पिता से स्वराज की #शिक्षा ही मिली जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र की तरह उन्होंने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को छुड़वा लिया। इससे उनके चरित्र में एक उदार अवयव नजर आता है। उसके बाद उन्होंने पिता की हत्या नहीं करवाई जैसा कि अन्य सम्राट किया करते थे। शाहजी राजे के मरने के बाद ही उन्होंने अपना राज्याभिषेक करवाया हाँलांकि वो उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे। उनके #नेतृत्व को सब लोग स्वीकार करते थे यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी।
🚩वह एक अच्छे सेनानायक के साथ एक अच्छे कूटनीतिज्ञ भी थे। कई जगहों पर उन्होंने सीधे युद्ध लड़ने की बजाय युद्ध से भाग लिया था। लेकिन यही उनकी कूटनीति थी, जो हर बार बड़े से बड़े शत्रु को मात देने में उनका साथ देती रही।
🚩शिवाजी महाराज की “गनिमी कावा” नामक कूटनीति, जिसमें शत्रु पर अचानक आक्रमण करके उसे हराया जाता है, विलोभनियता से और आदरसहित याद की जाती है।
🚩शिवाजी महाराज के गौरव में ये पंक्तियाँ प्रसिद्ध हैं-
🚩शिवरायांचे आठवावे स्वरुप। शिवरायांचा आठवावा साक्षेप।शिवरायांचा आठवावा प्रताप। भूमंडळी ॥
🚩कैसे कैसे #वीर सपूत हुए इस धरा पर…जिन्होंने अपने जीवन काल में कभी दुश्मनों के आगे घुटने नही टेके बल्कि साम,दाम, दण्ड भेद की निति द्वारा दुश्मनों को हराया।
🚩छत्रपति शिवाजी महाराज #भारत के महान योद्धा एवं रणनीतिकार थे । भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में बहुत से लोगों ने #शिवाजी के जीवनचरित्र से प्रेरणा लेकर भारत की स्वतन्त्रता के लिये अपना तन, मन धन न्यौछावर कर दिया।
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रिपोर्ट : अंग्रेजी भाषा और अधिक खर्च के कारण बच्चें छोड़ रहे है पढ़ाई

February 17, 2018
भारत भले अंग्रेजो के चँगुल से मुक्त हो गया हो लेकिन अंग्रेजों की मानसिकता अभि तक गई नही है और मैकाले द्वारा बनाई गई शिक्षा पद्धति आज भी चल रही है जिसके कारण बच्चे न अपने जीवन में उन्नत हो पाते हैं और न ही इतना खर्च कर पाते हैं और न ही विदेशी भाषा पढ़ पाते हैं जिसके कारण बच्चे पढ़ाई छोड़ रहे हैं और शिक्षा से वंचित रह जाते हैं ।
Report: Children are leaving due to English language and more expenses.
एनसीपीसीआर के एक अध्ययन में यह कहा गया है कि अंग्रेजी भाषा में संवाद, पाठ्यक्रम से अतिरिक्त गतिविधियों में खर्च एवं शिक्षा व्यय पर ‘बेतहाशा खर्च ’ ऐसे प्रमुख कारण हैं जिनके चलते दिल्ली के निजी स्कूलों में पढ़ने वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग एवं वंचित समूहों के छात्र अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। दिल्ली के निजी स्कूलों में वंचित वर्गों से बच्चों के दाखिले से संबंधित शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई), 2009 की धारा 12 (1) (सी) के क्रियान्वयन पर अध्ययन में यह भी पाया गया कि वर्ष 2011 में स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले छात्र करीब 26 प्रतिशत थे जो वर्ष 2014 में गिरकर 10 प्रतिशत हुआ था।
आरटीई अधिनियम की धारा 12 (1) (सी) कमजोर एवं वंचित वर्गों के बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के लिये निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों की जवाबदेही तय करती है। इसके अनुसार ऐसे स्कूलों को कक्षा एक या पूर्व स्कूली शिक्षा में छात्रों की कुल क्षमता के कम से कम एक चौथाई हिस्से में ऐसे वर्ग के छात्रों को दाखिला देना होता है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, विशेषकर शुरुवाती कक्षा अर्थात प्राथमिक एवं पूर्व-प्राथमिक स्तर की कक्षा में स्कूली पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले छात्रों का प्रतिशत प्राथमिक स्तर पर अधिक होता है। भारत में बाल अधिकार संरक्षण की शीर्ष संस्था का यह अध्ययन समूची दिल्ली के 650 स्कूलों द्वारा स्कूली पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले बच्चों के विषय में दिये गये वर्षवार आंकड़े पर आधारित था।
अध्ययन में कहा गया, ‘अभिभावकों का दावा है कि किताबें एवं पाठ्यक्रम से इतर गतिविधियों का खर्च बहुत अधिक होता है जिसके चलते वे स्कूल छोड़ देते हैं।’ एनसीपीसीआर ने यह भी सुझाव दिया कि जहां तक संभव हो बच्चों को पढ़ाने का माध्यम उनकी मातृभाषा होनी चाहिए।
लॉर्ड मैकाले ने कहा था : ‘मैं यहाँ  (भारत) की शिक्षा-पद्धति में ऐसे कुछ संस्कार डाल जाता हूँ कि आनेवाले वर्षों में भारतवासी अपनी ही संस्कृति से घृणा करेंगे… मंदिर में जाना पसंद नहीं करेंगे… माता-पिता को प्रणाम करने में तौहीन महसूस करेंगे साधु-संतों की खिल्ली उड़ायेंगे… वे शरीर से तो भारतीय होंगे लेकिन दिलोदिमाग से हमारे ही गुलाम होंगे..!
विवेकानन्द का शिक्षा-दर्शन
स्वामी विवेकानन्द मैकाले द्वारा प्रतिपादित और उस समय प्रचलित अग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के विरोधी थे, क्योंकि इस शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बाबुओं की संख्या बढ़ाना था। वह ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे बालक का सर्वांगीण विकास हो सके। बालक की शिक्षा का उद्देश्य उसको आत्मनिर्भर बनाकर अपने पैरों पर खड़ा करना है। स्वामी विवेकानन्द ने प्रचलित शिक्षा को ‘निषेधात्मक शिक्षा’ की संज्ञा देते हुए कहा है कि आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिसने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हों तथा जो अच्छे भाषण दे सकता हो, पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं करती, जो समाज सेवा की भावना विकसित नहीं करती तथा जो शेर जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती, ऐसी शिक्षा से क्या लाभ?
अतः स्वामीजी सैद्धान्तिक शिक्षा के पक्ष में नहीं थे, वे व्यावहारिक शिक्षा को व्यक्ति के लिए उपयोगी मानते थे। व्यक्ति की शिक्षा ही उसे भविष्य के लिए तैयार करती है, इसलिए शिक्षा में उन तत्वों का होना आवश्यक है, जो उसके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो।
स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में,
तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है।
स्वामी जी शिक्षा द्वारा लौकिक एवं पारलौकिक दोनों जीवन के लिए तैयार करना चाहते हैं । लौकिक दृष्टि से शिक्षा के सम्बन्ध में उन्होंने कहा है कि ‘हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र का गठन हो, मन का बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और व्यक्ति स्वावलम्बी बने।’ पारलौकिक दृष्टि से उन्होंने कहा है कि ‘शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।’
स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त
1. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।
2. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भर बने।
3. बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
4. धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
5. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।
6. शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।
7. शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।
8. सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये।
9. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाए ।
10. मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।
भारत सरकार को मैकाले द्वारा बनाई गई शिक्षा पद्धति तो खत्म कर देना चाहिए और वैदिक गुरुकुलों के अनुसार पढ़ाई करवानी चाहिए तभी व्यक्ति, समाज और देश भला होगा ।