जानिए गौहत्या का इतिहास, भारत मे गौमाता कि रक्षा कब होगी ?

🚩संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत जी ने बयान दिया है कि गौहत्या पर सारे देश में प्रतिबन्ध लगना चाहिए। हम उनके बयान का सम्मान करते है और आशा करते है कि वह मोदी जी पर इस अति आवश्यक कार्य के लिए दवाब बनाएंगे।
Know the history of cow slaughter, Gumata in India
when will be the protection?
🚩भारतीय इतिहास में गौ हत्या को लेकर कई आंदोलन हुए हैं और कई आज भी जारी हैं। लेकिन अभी तक गौहत्या पर प्रतिबन्ध नहीं लग सका है। इसका सबसे बड़ा कारण राजनितिक इच्छा शक्ति कि कमी होना है। आप कल्पना कीजिये हर रोज जब आप सोकर उठते है तब तक हज़ारों गौओं के गलों पर छूरी चल चुकी होती है। गौ हत्या से सबसे बड़ा फ़ायदा तस्करों एवं गाय के चमड़े का कारोबार करने वालों को होता है। इनके दबाव के कारण ही सरकार गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने से पीछे हट रही है। वरना जिस देश में गाय को माता के रूप में पूजा जाता हो वहां सरकार गौ हत्या रोकने में नाकाम है। आज हमारे देश कि जनता ने नरेन्द्र मोदी जी को सरकार चुनी है। सेक्युलरवाद और अल्पसंख्यकवाद के नाम पर पिछले अनेक दशकों से बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधिकारों का दमन होता आया है। उसी के प्रतिरोध में हिन्दू प्रजा ने संगठित होकर जात-पात से ऊपर उठकर एक सशक्त सरकार को चुना है। इसलिए यह इस सरकार का कर्त्तव्य बनता है कि वह बदले में हिन्दुओं कि शताब्दियों से चली आ रही गौरक्षा कि मांग को पूरा करे और गौ हत्या पर पूर्णत प्रतिबन्ध लगाए।
🚩अक्सर देखने में आता है कि बिकाऊ मीडिया और पक्षपाती पत्रकारों के प्रभाव से हम यह आंकलन निकाल लेते है कि सारे देशवासियों कि भी यही राय होगी जो इन पत्रकारों, बुद्धिजीवियों कि होती है। मगर देश कि जनता ने चुनावों में मोदी जी को जीत दिलाकर यह सिद्ध कर दिया कि नहीं यह केवल आसमानी किले है। इसलिए सरकार को चंद उछल कूद करने वालों कि संभावित प्रतिक्रिया से प्रभावित होकर गौहत्या पर प्रतिबन्ध लगाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। ध्यान दीजिये मुस्लिम शासनकाल में गौ हत्या पर रोक थी। भारत में मुस्लिम शासन के दौरान कहीं भी गौकशी को लेकर हिंदू और मुसलमानों में टकराव देखने को नहीं मिलता। बाबर से लेकर अकबर ने गोहत्या पर रोक लगाई थी। औरंगजेब ने इस नियम को तोड़ा तो उसका साम्राज्य तबाह हो गया। आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने भी 28 जुलाई 1857 को बकरीद के मौक़े पर गाय कि क़ुर्बानी न करने का फ़रमान जारी किया था। साथ ही चेतावनी दी थी कि जो भी गौ वध करने या कराने का दोषी पाया जाएगा उसे मौत कि सज़ा दी जाएगी।
🚩भारत में गौ हत्या को बढ़ावा देने में अंग्रेज़ों ने अहम भूमिका निभाई। जब 1700 ई. में अंग्रेज़ भारत आए थे उस वक़्त यहां गाय और सुअर का वध नहीं किया जाता था। हिंदू गाय को पूजनीय मानते थे और मुसलमान सुअर का नाम तक लेना पसंद नहीं करते थे। अंग्रेजों ने मुसलमानों को भड़काया कि क़ुरान में कहीं भी नहीं लिखा है कि गाय कि क़ुर्बानी हराम है। इसलिए उन्हें गाय कि क़ुर्बानी करनी चाहिए। उन्होंने मुसलमानों को लालच भी दिया और कुछ लोग उनके झांसे में आ गए। इसी तरह उन्होंने दलित हिंदुओं को सुअर के मांस कि बिक्री कर मोटी रकम कमाने का झांसा दिया। 18वीं सदी के आख़िर तक बड़े पैमाने पर गौ हत्या होने लगी। अंग्रेज़ों कि बंगाल, मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी सेना के रसद विभागों ने देश भर में कसाईखाने बनवाए। जैसे-जैसे यहां अंग्रेज़ी सेना और अधिकारियों कि तादाद बढ़ने लगी वैसे-वैसे गौ हत्या में भी बढ़ोत्तरी होती गई।
🚩गौ हत्या और सुअर हत्या कि आड़ में अंग्रेज़ों को हिंदू और मुसलमानों में फूट डालने का भी मौक़ा मिल गया। इस दौरान हिंदू संगठनों ने गौ हत्या के ख़िला़फ मुहिम छेड़ दी। नामधारी सिखों का कूका आंदोलन कि नींव गौरक्षा के विचार से जुड़ी थी। हरियाणा प्रान्त में हरफूल जाट जुलानी ने अनेक कसाईखानों को बर्बाद कर कसाइयों को यमलोक पंहुचा दिया। हरफूल जाट ने बलिदान दे दिया मगर पीछे नहीं हटें। 1857 कि क्रांति मंगल पांडेय का बलिदान इसी गौरक्षा अभियान के महान बलिदानों से सम्बंधित है। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द ने गौरक्षा के लिए आधुनिक भारत में सबसे व्यापक प्रयास आरम्भ किये। उन्होंने गौरक्षा एवं खेती करने वाले किसानों के लिए गौ करुणा निधि पुस्तक कि रचना कर सप्रमाण यह सिद्ध किया कि गौ रक्षा क्यों आवश्यक है। स्वामी जी यहाँ तक नहीं रुके। उन्होंने भारत कि पहली गौशाला रिवाड़ी में राव युधिष्ठिर के सहयोग से स्थापित की, जिससे गौरक्षा हो सके। इसके अतिरिक्त उन्होंने पांच करोड़ भारतियों के हस्ताक्षर करवाकर उन्हें महारानी विक्टोरिया के नाम गौहत्या पर प्रतिबन्ध लगाने का प्रस्ताव भेजने का अभियान भी चलाया। यह अभियान उनकी असमय मृत्यु के कारण पूरा न हुआ। मगर इससे भारत वर्ष में हज़ारों गौशाला कि स्थापना हुई एवं गौरक्षा अभियान को लोगों ने अपने प्रबंध से चलाया। भारत में गौरक्षा अभियान के समाचार लंदन भी पहुंचे। आख़िरकार महारानी विक्टोरिया ने वायसराय लैंस डाउन को पत्र लिखा। महारानी ने कहा, हालांकि मुसलमानों द्वारा कि जा रही गौ हत्या आंदोलन का कारण बनी है लेकिन हक़ीक़त में यह हमारे ख़िलाफ़ है क्योंकि मुसलमानों से कहीं ज़्यादा गौ वध हम कराते हैं। इसके ज़रिए ही हमारे सैनिकों को गौ मांस मुहैया हो पाता है। इसके बाद 1892 में देश के विभिन्न हिस्सों से सरकार को हस्ताक्षरयुक्त पत्र भेजकर गौ वध पर रोक लगाने कि मांग की जाने लगी। इन पत्रों पर हिंदुओं के साथ मुसलमानों के भी हस्ताक्षर होते थे। 1947 के पश्चात भी गौरक्षा के लिए अनेक अभियान चले। 1966 में हिन्दू संगठनों ने देशव्यापी अभियान चलाया। हज़ारों गौभक्तों ने गोली खाई मगर पीछे नहीं हटे। राजनितिक इच्छा शक्ति कि कमी के चलते यह अभियान सफल नहीं हुआ।
🚩इस समय भी देशव्यापी अभियान चलाया जा रहा है। जिसमें केंद्र सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और भारतीय गौवंश कि रक्षा के लिए कठोर क़ानून बनाए जाने कि मांग की जा रही है। गाय कि रक्षा के लिए अपनी जान देने में भारतीय मुसलमान किसी से पीछे नहीं हैं. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले के गांव नंगला झंडा निवासी डॉ. राशिद अली ने गौ तस्करों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी जिसके चलते 20 अक्टूबर 2003 को उन पर जानलेवा हमला किया गया और उनकी मौत हो गई. उन्होंने 1998 में गौ रक्षा का संकल्प लिया था और तभी से डॉक्टरी का पेशा छोड़कर वह अपनी मुहिम में जुट गए थे गौ वध को रोकने के लिए विभिन्न मुस्लिम संगठन भी सामने आए हैं दारूल उलूम देवबंद ने एक फ़तवा जारी करके मुसलमानों से गौ वध न करने कि अपील की है. दारूल उलूम देवबंद के फतवा विभाग के अध्यक्ष मुती हबीबुर्रहमान का कहना है कि भारत में गाय को माता के रूप में पूजा जाता है। इसलिए मुसलमानों को उनकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए गौ वध से ख़ुद को दूर रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि शरीयत किसी देश के क़ानून को तोड़ने का समर्थन नहीं करती। क़ाबिले ग़ौर है कि इस फ़तवे कि पाकिस्तान में कड़ी आलोचना की गई थी। इसके बाद भारत में भी इस फ़तवे को लेकर ख़ामोशी अख्तियार कर ली गई।
🚩गाय भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक अहम भाग है। यहां गाय कि पूजा की जाती है। यह भारतीय संस्कृति से जुड़ी है। महात्मा गांधी कहते थे कि अगर निस्वार्थ भाव से सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहीं देखने को मिलता है तो वह गौ माता है। गाय का ज़िक्र करते हुए वह लिखते है-
“गौ माता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ है। हमारी माता हमें दो वर्ष दुग्धपान कराती है और यह आशा करती है कि हम बड़े होकर उसकी सेवा करेंगे। गाय हमसे चारे और दाने के अलावा किसी और चीज़ कि आशा नहीं करती। हमारी मां प्राय: रूग्ण हो जाती है और हमसे सेवा कि अपेक्षा करती है। गौ माता शायद ही कभी बीमार पड़ती है। वह हमारी सेवा आजीवन ही नहीं करती अपितु मृत्यु के बाद भी करती है। अपनी मां कि मृत्यु होने पर हमें उसका दाह संस्कार करने पर भी धनराशि व्यय करनी पड़ती है। गौ माता मर जाने पर भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होती है जितनी अपने जीवनकाल में थी। हम उसके शरीर के हर अंग-मांस, अस्थियां, आंतों, सींग और चर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह बात जन्म देने वाली मां कि निंदा के विचार से नहीं कह रहा हूं बल्कि यह दिखाने के लिए कह रहा हूं कि मैं गाय कि पूजा क्यों करता हूं।”- महात्मा गाँधी
🚩महात्मा गाँधी का नाम लेकर पूर्व में अनेक सरकारें बनी मगर गौहत्या पर प्रतिबन्ध नहीं लगा। आज इस देश कि सरकार से हम प्रार्थना करते है कि समस्त देश कि भवनाओं का सम्मान करते हुए गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाए एवं गौहत्या करने वाले को कठोर से कठोर दंड मिले। – डॉ विवेक आर्य
#गौरक्षा_राष्ट्रधर्म_है
#SaveGauRakshaks
🚩(1966 में गौहत्या पर प्रतिबन्ध के समर्थन में संसद का खेराव करते महान गौरक्षक। उनके तप और बलिदान के लिए कोटि कोटि नमन)
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हिन्दू संत को झूठे रेप केस में सजा करवाने वाले अधिकारी को चीते ने फाड़ डाला…

19 May 2018
🚩सन 1994 द्वारका गुजरात के प्रसिद्ध संत केशवानंद स्वामी पर उनके ही ट्रस्ट(‘सनातन सेवा मंडल’) द्वारा संचालित स्कूल में पढ़ती रीता नाम कि छात्रा ने उन पर बलात्कार का आरोप लगाया ।
🚩मीडिया को तो मानो एक बड़ा मसाला ही मिल गया,  दिन-रात स्वामी जी कि बदनामी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी केशवानंदजी को मीडिया के द्वारा इतना बदनाम किया गया था कि कोई वकील उनकी तरफ से केस लड़ने को तैयार नहीं हुआ ।
Cheetah torn by an officer punishing the
Hindu saint in a false rape case
🚩अनेक पुलिस अधिकारियों ने आपस में मिलकर स्वामी जी के खिलाफ झूठे गवाह बनाये।
🚩स्वामी जी को गिरफ्तार करके जेल में भेज दिया गए। सेशन कोर्ट में केस चला । आखिरकार झूठे सबूतों के आधार पर सेशन कोर्ट ने स्वामी जी को 12 साल की सजा सुना दी ।
🚩लेकिन निर्दोष संत को सताने पर प्रकृति कोपित हो जाती है जिस अधिकारी ने यह षड्यंत्र रचा था उसको गोधरा (गुजरात) में चीते ने फाड़ डाला । दूसरा अधिकारी अशांति कि खाई में जा गिरा, तीसरे अधिकारी को भी भयंकर भोगना पडा, सभी अधिकारी तबाह हो गये।
🚩स्वामी केशवानन्द जी का केस उच्च न्यायालय में पहुँचा 2001 में स्वामी जी को निर्दोष बरी कर दिया गया पर 7 साल तक उनको जेल में ही रहना पड़ा ।
🚩उनको सजा दिलवाने वाले तो तबाह हो ही गये पर जो उनकी इतनी बदनामी हुई उसका क्या?
 इतने साल जो यातनाएं सहनी पड़ी और जो समय बर्बाद हुआ उसका क्या? क्या कोई न्यायालय या मीडिया या सरकार उसकी भरपाई कर पायेगा ?
🚩बता दें कि जलियांवाला बाग हत्याकांड का मुख्य गुनहगार जनरल डायर जिसने ग्यारह सौ निर्दोष लोगों कि जान ली थी वह अपने अंतिम दिनों में पागल हो गया था। वह बार-बार चिल्लाता था कि जिनके ऊपर मैंने गोलियां चलाई थी उनकी आत्मा मुझे परेशान कर रही है। उसके घरवालों ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया था । अंत में वह पैरालिसिस सहित तमाम बीमारियों का शिकार होकर पागलपन में ही मर गया ।
🚩ठीक यही साध्वी प्रज्ञा और दूसरे हिंदुओं पर अमानवीय अत्याचार करने वाले महाराष्ट्र एटीएस के अधिकारियों के साथ हो रहा है पहले हेमंत करकरे का असामयिक निधन हुआ फिर 2 सालों के बाद उसकी पत्नी का निधन हुआ । फिर दूसरे अत्याचारी हिमांशु रॉय को कैंसर हुआ और उसने अपनी बीमारी से परेशान होकर अपने मुंह में रिवाल्वर रखकर फायरिंग करके आत्महत्या कर लिया ।
🚩वर्तमान में भी जो हिन्दू संत आसारामजी बापू के साथ अत्याचार हो रहा है उनको कांग्रेस सरकार के इशारे पर फंसाया गया। आज कांग्रेस कि क्या हालत है पूरे देश से छुपा नहीं है । पूरे भारत में केवल दो ही राज्यो में बची है ।
🚩स्वामी केशवानंद कि तरह का ही केस आसारामजी बापू के लिए भी बनाया गया है:
🚩तभी तो शाहजहांपुर(उत्तर प्रदेश) कि लड़की, (मध्य प्रदेश) छिंदवाड़ा में पढ़ने वाली, तथाकथित
घटना जोधपुर(राजस्थान) कि FIR दिल्ली में जाकर रात को 2:25 बजे होती है….वो भी घटना के पांच दिनों के बाद…!
🚩जब FIR में rape (बलात्कार) शब्द नही है, मेडिकल रिपोर्ट में rape कि पुष्टि नहीं हुई, मेडिकल रिपोर्ट में एक खरोंच भी नही आई । फिर भी राष्ट्र विरोधी ताकतों के इशारे पर बिकाऊ नेता और मीडिया के पूरे तंत्र ने बापू आसारामजी को आजीवन जेल के अन्दर रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया ।
🚩स्वामी केशवानंद जी को षड़यंत्र के तहत जेल भेजने के लिए उनके ही भक्त होने का दिखावा करके जानबूझकर उन परिवार वालों ने अपने बेटी को स्कूल में दाखिल कराया था ये साबित हो गया। अब उनको ये सब करने के लिए कितने पैसे मिले होंगे वो तो भगवान जाने ।
🚩 ऐसे ही मामला हिन्दू संत आसाराम बापू पर है उनके ही भक्त कि गुरुकुल की लड़की को तैयार किया गया है फर्क इतना है कि केशवानन्द जी पर बलात्कार का केस लगाया गया और बापू आसारामजी पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया है मेडिकल रिपोर्ट में कुछ नही होते हुए भी और सबसे बड़ा सबूत खुद लड़की कि कॉल डिटेल के अनुसार लड़की उस रात किसी संदिग्ध व्यक्ति से लगातार संपर्क में थी । लड़की कि उम्र के संबंध में भी दस्तावेज न्यायलय में पेश किए गए। अलग-अलग दस्तावेजों में लड़की कि उम्र अलग-अलग पाई गई ।
🚩फिर भी बापू आसारामजी को पॉक्सो एक्ट के तहत उम्रकैद कि सजा दे दी गई ।
🚩कैसी विडंबना है!!
🚩आगे जब बापू आसारामजी के केस कि अपील उच्च न्यायालय में होगी और उसमें वो निर्दोष बरी होंगे तो कौन लौटाएगा उनका वो समय, जो उन्होंने जेल में बिताया ??
 🚩मीडिया द्वारा कि गई बदनामी और उनकी उम्र का लिहाज न करते हुए उन पर कि गई यातनाओं का जिम्मेदार कौन होगा ???
🚩क्या भारत में हिन्दू संत होकर हिन्दू संस्कृति के लिए काम करना गुनाह है?
🚩अगर नहीं तो क्यों एक के बाद एक संतों को पहले फंसाया जाता है फिर सालों जेल में रखकर उन्हें निर्दोष बरी किया जाता है !!
ये सिलसिला आखिर कबतक चलता रहेगा ??
 🚩आखिर कब तक हिन्दू भी मूकदर्शक बना चुपचाप सब देखता रहेगा ???
🚩पिछले कुछ सालों से विदेशी ताकतों के इशारे पर संतों को जेल भेजने का षड्यंत्र पूरे जोरशोर से चल रहा है ।
🚩ये हम सब हिंदुओं के लिए भी शर्मनाक है कि हम सब ये देखकर भी मौन है और षड्यंत्रकारी अपने षडयंत्रों में सफल हो रहे हैं ।
🚩पर षड्यंत्रकारी सुन ले । ऊपर वाले कि लाठी में आवाज नहीं होती पर वो किसी को छोड़ती नहीं है हिन्दू भले अपने हिन्दू संतों के लिए कुछ न करे पर सबके सामने हैं कि अभीतक जिन अधिकारियों ने राष्ट्र विरोधी ताकतों के इशारे पर जिन हिन्दू संतों और हिंदुत्वनिष्ठों को फंसाने का काम किया । भगवान ने उन्हें सबक सीखा दिया । अभी वाले भी सावधान हो जाये तो अच्छा है नहीं तो आपका भी आने वाला समय बहुत बुरा है । क्योंकि कर्म किसी का पीछा नहीं छोड़ता । कर्म करने पर आपका अधिकार है उसके फल पर नहीं ।
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धर्म के लिए प्राण दे दिए पर धर्म परिवर्तन नही किया, जानिए बलिदान कि महान गाथा को

🚩मुगल काल में बलिदान के कई ऐसे किस्से हैं जिन्हें उंगलियों पर गिनाया जा सकता है औरंगजेब के समय में हिंदुओं पर ऐसा कहर ढाया गया कि धरती कांप उठी और आसमान थराने लगा था जिहाद के नाम पर हिंदुओं को बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया जा रहा था औरंगजेब कि सेना को सरे राह जो भी हिंदु या सिक्ख मिलता उसे हिंदुत्व छोडऩे के लिए बाध्य किया जाता इनकार करने पर उसे यातनाएं दी जाती और फिर उसका सिर कलम कर दिया जाता धर्म परिवर्तन के लिए हिंदुओं को बकरों की तरह काटा जाता ।
Do not change religion on the
life of religion, know the great saga of sacrifice
🚩औरंगजेब ने इस उद्देश्य के लिए कश्मीर को चुना क्योंकि उन दिनों कश्मीर हिन्दू सभ्यता संस्कृति का गढ़ था वहाँ के पण्डित हिन्दू धर्म के विद्धानों के रूप में विख्यात थे औरंगजेब ने सोचा कि यदि वे लोग इस्लाम धारण कर लें तो बाकी अनपढ़ व मूढ़ जनता को इस्लाम में लाना सहज हो जायेगा और ऐसे विद्वान समय आने पर इस्लाम के प्रचार में सहायक बनेंगे और जनसाधारण को दीन के दायरे में लाने का प्रयत्न करेंगे अतः उसने इफ़तखार ख़ान को शेर अफगान का खिताब देकर कश्मीर भेज दिया और उसके स्थान पर लाहौर का राज्यपाल,गवर्नर फिदायर खान को नियुक्त किया।
लेकिन गुरु तेगबहादुर के पास जब कश्मीर से हिन्दू औरंगजेब के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने कि प्रार्थना करने आये तो वे उससे मिलने दिल्ली चल दिये।
🚩दिल्ली जाते समय मार्ग में आगरा में ही उनके साथ भाई मतिदास, भाई सतिदास तथा भाई दयाला को बन्दी बना लिया गया। इनमें से पहले दो सगे भाई थे। हिन्दू का स्वाभिमान नष्ट होता जा रहा था। उनकी अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध प्रतिकार करने कि शक्ति लुप्त होती जा रही थी आगरे से हिन्दुओं पर अत्याचार कि खबर फैलते फैलते लाहौर तक पहुंच गयी हिन्दू स्वाभिमान के प्रतीक भाई मतिराम कि आत्मा यह अत्याचार सुन कर तड़प उठी उन्हें विश्वास था कि उनके प्रतिकार करने से ,उनके बलिदान देने से निर्बल और असंगठित हिन्दू जाति में नवचेतना का संचार होगा।
🚩भाई मतिराम तत्काल लाहौर से दिल्ली के लिए निकले लेकिन आगरे में इस्लामी मतांध तलवार के सामने सर झुकाए हुए मृत्यु के भय से अपने पूर्वजों के धर्म को छोडऩे को तैयार हिंदुओं को देखा और उन्होंने कायर हिन्दुओ को ललकार कर कहा- कायर कहीं के मौत के डर से अपने प्यारे धर्म को छोडऩे में क्या तुमको लज्जा नहीं आती ! भाई मतिराम कि बात सुनकर मतांध मुसलमान हंस पड़े और उससे कहाँ कि कौन हैं तू, जो मौत से नहीं डरता? भाई मतिराम ने कहाँ कि अगर तुझमें वाकई दम हैं तो मुझे मुसलमान बना कर दिखाओ।
🚩भाई मतिराम जी को बंदी बना लिया गया उन्हें अभियोग के लिए आगरे से दिल्ली भेज दिया गया।
🚩तब हाकिम ने बोला तो तुम्हे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा तब मतिराम ने कहा कि मुझे धर्म छोडऩे कि अपेक्षा अपना शरीर छोडऩा स्वीकार है।हाकिम ने फिर कहा कि मतिराम फिर से सोच लो। मतिराम ने फिर कहा कि मेरे पास सोचने का वक्त नहीं हैं हाकिम,तुम केवल और केवल मेरे शरीर को मार सकते हो मेरी आत्मा को नहीं क्योंकि आत्मा अजर ,अमर है। न उसे कोई जला सकता हैं न कोई मार सकता है मतिराम को इस्लाम कि अवमानना के आरोप में आरे से चीर कर मार डालने का हाकिम ने दंड दे दिया।चांदनी चौक के समीप खुले मैदान में लोहे के सीखचों के घेरे में मतिराम को लाया गया।
🚩भाई मतिराम को दो जल्लाद उनके दोनों हाथों में रस्से बांधकर उन्हें दोनों ओर से खींचकर खड़े हो गए, दोनों ने उनकी ठोड़ी और पीठ थामी और उनके सर पर आरा रखा । लकड़ी के दो बड़े तख्तों में जकड़कर उनके सिर पर आरा चलाया जाने लगा। जब आरा दो तीन इंच तक सिर में धंस गया तो काजी ने उनसे कहा – मतिदास, अब भी इस्लाम स्वीकार कर ले। शाही जर्राह तेरे घाव ठीक कर देगा। तुझे दरबार में ऊँचा पद दिया जाएगा और तेरी पाँच शादियाँ कर दी जायेंगी।
🚩भाई मतिदास ने व्यंग्यपूर्वक पूछा – काजी, यदि मैं इस्लाम मान लूँ तो क्या मेरी कभी मृत्यु नहीं होगी ? काजी ने कहा कि यह कैसे सम्भव है। जो धरती पर आया है उसे मरना तो है ही। भाई जी ने हँसकर कहा – यदि तुम्हारा इस्लाम मजहब मुझे मौत से नहीं बचा सकता तो फिर मैं अपने पवित्र हिन्दू धर्म में रहकर ही मृत्यु का वरण क्यों न करूँ ?
उन्होंने जल्लाद से कहा कि अपना आरा तेज चलाओ जिससे मैं शीघ्र अपने प्रभु के धाम पहुँच सकूँ। यह कहकर वे ठहाका मार कर हँसने लगे।
🚩काजी ने कहा कि वह मृत्यु के भय पागल हो गया है। भाई जी ने कहा – मैं डरा नहीं हूँ। मुझे प्रसन्नता है कि मैं धर्म पर स्थिर हूँ। जो धर्म पर अडिग रहता है उसके मुख पर लाली रहती है; पर जो धर्म से विमुख हो जाता है, उसका मुँह काला हो जाता है। कुछ ही देर में उनके शरीर के दो टुकड़े हो गये। भाई मतिदास गुरू हर गोबिंद सिंह के शिष्य थे उनका जन्म पंजाब के जिला जेलम में ब्राह्मण परिवार में हुआ था अन्याय के खिलाफ उन्होंने गुरू हरगोविंद के साथ मिलकर कई लड़ाइयां लड़ी थीं उन्होंने नीर्भीक होकर अपने प्राण दे दिए थे लेकिन इस्लाम को कबूल नहीं किया था।
🚩औरंगजेब चाहता था कि गुरुजी भी मुसलमान बन जायें। उन्हें डराने के लिए इन तीनों को तड़पा-तड़पा कर मारा गया पर गुरुजी विचलित नहीं हुए।
🚩औरंगजेब ने सबसे पहले 9 नवम्बर, 1675 को भाई मतिदास को आरे से दो भागों में चीरने को कहा।
🚩अगले दिन 10 नवम्बर को उनके छोटे भाई सतिदास को रुई में लपेटकर जला दिया गया। भाई दयाला को पानी में उबालकर मारा गया। 11 नवम्बर को चाँदनी चौक में गुरु तेगबहादुर का भी शीश काट दिया गया।
🚩ग्राम करयाला, जिला झेलम (वर्तमान पाकिस्तान) निवासी भाई मतिदास एवं सतिदास के पूर्वजों का सिख इतिहास में विशेष स्थान है। उनके परदादा भाई परागा जी छठे गुरु हरगोविन्द के सेनापति थे। उन्होंने मुगलों के विरुद्ध युद्ध में ही अपने प्राण त्यागे थे। उनके समर्पण को देखकर गुरुओं ने उनके परिवार को ‘भाई’ की उपाधि दी थी। भाई मतिदास के एकमात्र पुत्र मुकुन्द राय का भी चमकौर के युद्ध में बलिदान हुआ था।
🚩भाई मतिदास के भतीजे साहबचन्द और धर्मचन्द गुरु गोविन्दसिंह के दीवान थे। साहबचन्द ने व्यास नदी पर हुए युद्ध में तथा उनके पुत्र गुरुबख्श सिंह ने अहमदशाह अब्दाली के अमृतसर में हरिमन्दिर पर हुए हमले के समय उसकी रक्षार्थ प्राण दिये थे। इसी वंश के क्रान्तिकारी भाई बालमुकुन्द ने 8 मई, 1915 को केवल 26 वर्ष की आयु में फाँसी पायी थी। उनकी साध्वी पत्नी रामरखी ने पति की फाँसी के समय घर पर ही देह त्याग दी।
🚩लाहौर में भगतसिंह आदि सैकड़ों क्रान्तिकारियों को प्रेरणा देने वाले भाई परमानन्द भी इसी वंश के तेजस्वी नक्षत्र थे।
🚩हिन्दू धर्म छोडऩे के लिए जब बकरों कि तरह काट दिए जाते थे इन्सान । आखिर वामपंथी इतिहासकारो कि क्या मज़बूरी थी कि उन्होंने इन बातो का जिक्र इतिहास कि किताबो में नही किया ??? और ऐसे नीच मुगलों को महान बताया ।
🚩किसी ने ठीक ही कहा है –
सूरा सो पहचानिये, जो लड़े दीन के हेत
पुरजा-पुरजा कट मरे, तऊँ न छाड़त खेत ।।
कहते हैं की प्रतिदिन सवा मन हिंदुओं के जनेऊ कि होली फूंक कर ही औरंगजेब भोजन करता था….!!
🚩आज हिंदुस्तान में मुगल काल के गुणगान हो रहे हैं इनके नाम कि सङके व इमारते हैं धिक्कार है उनको जो ऐसे क्रुर, हत्यारे मुगलों का गुणगान करते है ।
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1000 पुरुषों को ब्लैकमेल करके फ़साने वाली लड़की गिरफ्तार

17 May 2018
🚩पैसे ऐठने के लिए आज एक ट्रेंड चल पड़ा है बलात्कार के नये बने कानून का दुरुपयोग करके निर्दोष पुरषों को फ़साओं और पैसा नही दे तो केस कर दो या हत्या कर दी जाती है ।
🚩जयपुर कि प्रिया सेठ राजस्थान कि सबसे बड़ी महिला गैंगस्टर बनना चाहती है। वैश्यावृति, ठगी, लूट जैसी वारदातों में गिरफ्तार हो चुकी प्रिया इस बार एक युवक कि हत्या का आरोप में गिरफ्तार हुई है।
Girl arrested for blackmailing 1000 men
🚩लेक्चरर पिता प्रिया को शिक्षा कि दुनिया का उजियारा बनाना चाहते थे शिक्षक बनाना चाहते थे। लेकिन जिस्मफरोशी के धंधे में वो ऐसी उतरी कि हत्या जैसा जघन्य अपराध भी कर बैठी। अपने दो साथियों के साथ मिलकर उसने सोशल मीडिया पर दोस्त बने दुष्यन्त को मौत के घाट उतार दिया। इतना ही नहीं बल्कि लाश को सूटकेस में पैक कर जयपुर-दिल्ली हाईवे पर फेंक दिया।
🚩पुलिस के मुताबिक इसी साल मार्च में दुष्यन्त कि दोस्ती सोशल मीडिया के जरिए प्रिया सेठ से हुई थी। प्रिया कॉलगर्ल के रूप में एक साइट चलाती है जिसके चंगुल में दुष्यन्त फंस गया। प्रिया को लगा कि दुष्यन्त धनवान है। उसने मुम्बई में मॉडलिंग के लिए स्ट्रगल कर रहे अपने साथी दिक्षान्त कामरा को पैसे कमाने का शॉर्टकट समझाते हुए। उसके एक और साथी लक्ष्य वालिया को शामिल कर लिया।
🚩प्रिया फोन कर दुष्यन्त को फ्लेट पर बुलाया, मारपीट कि और बंधक बना लिया। दुष्यन्त से घर फोन करवाया गया कि दस लाख रुपए उसके एकाउंट में डाल दें नहीं तो उसे बलात्कार के केस में फंसा दिया जाएगा। पहले ही एक एक्सीडेन्ट में अपने दो बेटे गंवा चुके दुष्यन्त के पिता घबरा गए तीन लाख रुपए उसके अकाउंट में डलवा भी दिए गए। फिर भी तीनो ने मिलकर दुष्यंत कि हत्या कर दी।
🚩पुलिस के मुताबिक प्रिया सेठ पहले भी करीब एक हज़ार लोगों के साथ ठगी कि वारदात को अंजाम दे चुकी है। ब्लेकमैलिंग, लूट और जिस्मफरोशी के धंधे में जयपुर के अलग अलग थानों में गिरफ्तार हो चुकी है। उसके आरोपी साथी शॉर्टकट से पैसा कमाने के लालच में हत्या जैसा अपराध कर बैठे। 
🚩निर्भया कांड के बाद #नारियों की सुरक्षा हेतु बलात्कार-निरोधक नये #कानून बनाये गये ।परंतु दहेज विरोधी कानून कि तरह इनका भी भयंकर दुरुपयोग हो रहा है ।
🚩2012 में दर्ज किये गये रेप केसों में से ज्यादातर केस #बोगस पाये गये । 2013 कि शुरुआत में यह आँकड़ा 75% तक पहुँच गया । 
🚩दिल्ली महिला आयोग कि जाँच के अनुसार अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 तक #बलात्कार कि कुल 2,753 शिकायतों में से 1,466 शिकायतें #झूठी पायी गयीं । 
🚩जैसे दहेज विरोधी अधिनियम में संशोधन किया गया ऐसे ही #POCSO कानून में भी संशोधन की जरुरत है। 
🚩विभिन्न कानूनविदों, न्यायधीशों व बुद्धिजीवियों ने भी इस कानून के बड़े स्तर पर दुरुपयोग के संदर्भ में चिंता जतायी है ।
🚩दिल्ली के एक फास्ट ट्रैक कोर्ट कि #न्यायाधीश #निवेदिता #शर्मा ने #बलात्कार के एक मामले में #आरोपी को बरी करते हुए टिप्पणी की कि ‘इन दिनों बलात्कार या यौन-शोषण के झूठे मुकदमे दर्ज कराने का #ट्रेंड बढ़ता जा रहा है जो चिंताजनक है। इस तरह के चलन को रोकना बेहद जरूरी है। 
🚩बलात्कार निरोधक कानूनों में संशोधन कब ?
🚩‘‘करोडों लोगों के आस्था-केन्द्र धर्मगुरुओं, प्रसिद्ध गणमान्य हस्तियों एवं आम लोगों को रेप एवं यौन-शोषण से संबंधित कानूनों कि आड में फँसाकर देश की जडें काटी जा रही हैं । स्वार्थी तत्त्वों एवं राष्ट्र-विरोधी ताकतों का मोहरा बनी महिलाओं के कारण समस्त महिला समुदाय कलंकित हो रहा है । 
🚩महिलाओं को नौकरी नहीं मिल रही है, महिलाओं पर से लोगों का विश्वास घटता जा रहा है । इसलिए बलात्कार निरोधक कानूनों का दुरुपयोग रोकने के लिए इनमें शीघ्र संशोधन किये जायें । 
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70 सालों से जजों कि नियुक्ति में सेक्स, पैसा , ब्लैक मेल होता है : जनार्दन मिश्रा

🚩अभिषेक मनु सिंघवी का हाथ जैसे ही उस अर्द्धनग्न महिला के कमर के उपर पहुँचा उस महिला ने चिहुँकते हुए बड़े प्यार से पूछा- “जज कब बना रहे हो?” …..बोलो ना डियर “जज कब बना रहे हो” …???
🚩अब साहब ने जो भी उत्तर दिया था वह सारा का सारा सीन उस सेक्स-सीडी में रिकॉर्ड हो गया …..
🚩और यही सीडी कांग्रेस के उस बड़े नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी के राजनीतिक पतन का कारण बना।
🚩पिछले 70 सालों से जजों कि नियुक्ति में सेक्स, पैसा , ब्लैक मेल एवं दलाली के जरिए जजों को चुना जाता रहा है।
🚩अजीब बिडम्बना है कि हर रोज दुसरों को सुधरने कि नसीहत देने वाले लोकतंत्र के दोनों स्तम्भ मीडिया और न्यायपालिका खुद सुधरने को तैयार नही हैं।
Sex, money, black mail in the appointment
of judges for 70 years: Janardhan Mishra
🚩जब देश आज़ाद हुआ तब जजों कि नियुक्ति के लिए ब्रिटिश काल से चली आ रही “कोलेजियम प्रणाली” भारत सरकार ने अपनाई…. यानी सीनियर जज अपने से छोटे अदालतों के जजों कि नियुक्ति करते है।
🚩इस कोलेजियम में जज और कुछ वरिष्ठ वकील भी शामिल होते है। जैसे सुप्रीमकोर्ट के जज हाईकोर्ट के जज कि नियुक्ति करते है और हाईकोर्ट के जज जिला अदालतों के जजों कि नियुक्ति करते है ।
🚩इस प्रणाली में कितना भ्रष्टाचार है उनलोगों ने अभिषेक मनु सिंघवी कि सेक्स सीडी में देखी थी…. अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीमकोर्ट कि कोलेजियम के सदस्य थे और उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट के लिए जजों कि नियुक्ति करने का अधिकार था…
🚩उस सेक्स सीडी में वो वरिष्ठ वकील अनुसुइया सालवान को जज बनाने का लालच देकर उसके साथ इलू इलू करते पाए गए थे वो भी कोर्ट परिसर के ही किसी खोपचे में।
🚩कोलेजियम सिस्टम से कैसे लोगो को जज बनाया जाता है और उसके द्वारा राजनितिक साजिशें कैसे कि जाती है उसके दो उदाहरण देखिये …….
*पहला उदाहरण ….*
🚩किसी भी राज्य के हाईकोर्ट में जज बनने कि सिर्फ दो योग्यता होती है, वो भारत का नागरिक हो और 10 साल से किसी हाईकोर्ट में वकालत कर रहा हो या किसी राज्य का महाधिवक्ता हो ।
🚩वीरभद्र सिंह जब हिमाचल में मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने सारे नियम कायदों को ताक पर रखकर अपनी बेटी अभिलाषा कुमारी को हिमाचल का महाधिवक्ता नियुक्त कर दिया फिर कुछ दिनों बाद सुप्रीमकोर्ट के जजों के कोलेजियम में उन्हें हाईकोर्ट के जज कि नियुक्ति कर दी और उन्हें गुजरात हाईकोर्ट में जज बनाकर भेज दिया गया।
🚩तब कांग्रेस, गुजरात दंगो के बहाने मोदी को फंसाना चाहती थी और अभिलाषा कुमारी ने जज कि हैसियत से कई निर्णय मोदी के खिलाफ दिया … हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने बाद में उसे बदल दिया था।
*दूसरा उदाहरण….*
🚩1990 में जब लालूप्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे तब कट्टरपंथी मुस्लिम आफ़ताब आलम को हाईकोर्ट का जज बनाया गया….बाद में उन्हे प्रोमोशन देकर सुप्रीमकोर्ट का जज बनाया गया… उनकी नरेंद्र मोदी से इतनी दुश्मनी थी कि तीस्ता शीतलवाड़ और मुकुल सिन्हा गुजरात के हर मामले को इनकी ही बेंच में अपील करते थे…इन्होने नरेद्र मोदी को फँसाने के लिए अपना एक मिशन बना लिया था।
🚩बाद में आठ रिटायर जजों ने जस्टिस एम बी सोनी कि अध्यक्षता में सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर आफ़ताब आलम को गुजरात दंगो के किसी भी मामलो कि सुनवाई से दूर रखने कि अपील की थी
🚩जस्टिस सोनी ने आफ़ताब आलम के दिए 12 फैसलों का डिटेल में अध्ययन करके उसे सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस को दिया था और साबित किया था कि आफ़ताब आलम चूँकि मुस्लिम है इसलिए उनके हर फैसले में भेदभाव स्पष्ट नजर आ रहा है।
🚩फिर सुप्रीमकोर्ट ने जस्टिस आफ़ताब आलम को गुजरात दंगो से किसी भी केस कि सुनवाई से दूर कर दिया।
🚩जजों के चुनाव के लिए कोलेजियम प्रणाली के स्थान पर एक नई विशेष प्रणाली कि जरूरत महसूस कि जा रही थी।
🚩जब वर्तमान सरकार आई तो तीन महीने बाद ही संविधान का संशोधन ( 99 वाँ संशोधन) करके एक कमीशन बनाया गया जिसका नाम दिया गया NationalJudicial Appointments Commission (NJAC)
🚩इस कमीशन के तहत कुल छः लोग मिलकर जजों की नियुक्ति कर सकते थे।
*🚩A.* इसमें एक सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश ,
*B.* सुप्रीम कोर्ट के दो सीनियर जज जो मुख्य न्यायाधीश से ठीक नीचे हों ,
*C.* भारत सरकार का कानून एवं न्याय मंत्री ,
*D.* और दो ऐसे चयनित व्यक्ति जिसे तीन लोग मिलकर चुनेंगे।( प्रधानमंत्री , मुख्य न्यायाधीश एवं लोकसभा में विपक्ष का नेता) ।
🚩परंतु एक बड़ी बात तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट ने इस कमीशन को रद्द कर दिया  वैसे इसकी उम्मीद भी कि जा रही थी।
🚩इस वाकये को न्यायपालिका एवं संसद के बीच टकराव के रूप में देखा जाने लगा…भारतीय लोकतंत्र पर सुप्रीम कोर्ट के कुठाराघात के रूप में इसे लिया गया।
🚩यह कानून संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित किया गया था जिसे 20 राज्यों कि विधानसभा ने भी अपनी मंजूरी दी थी।
🚩सुप्रीम कोर्ट यह भूल गया थी कि जिस सरकार ने इस कानून को पारित करवाया है उसे देश कि जनता ने पूर्ण बहुमत से चुना है।
🚩सिर्फ चार जज बैठकर करोड़ों लोगों कि इच्छाओं का दमन कैसे कर सकते हैं ?
🚩क्या सुप्रीम कोर्ट इतना ताकतवर हो सकता है कि वह लोकतंत्र में जनमानस कि आकांक्षाओं पर पानी फेर सकता है ?
🚩जब संविधान कि खामियों को देश कि जनता परिमार्जित कर सकती है तो न्यायपालिका कि खामियों को क्यों नहीं कर सकती ?
🚩यदि NJAC को सुप्रीम कोर्ट असंवैधानिक कह सकता है तो इससे ज्यादा असंवैधानिक तो कोलेजियम सिस्टम है जिसमें ना तो पारदर्शिता है और ना ही ईमानदारी ?
🚩कांग्रेसी सरकारों को इस कोलेजियम से कोई दिक्कत नहीं रही क्योंकि उन्हें पारदर्शिता कि आवश्यकता थी ही नहीं।
🚩मोदी सरकार ने एक कोशिश की थी परंतु सुप्रीम कोर्ट ने उस कमीशन को रद्दी कि टोकरी में डाल दिया।
🚩शूचिता एवं पारदर्शिता का दंभ भरने वाले सुप्रीम कोर्ट को तो यह करना चाहिए था कि इस नये कानून (NJAC) को कुछ समय तक चलने देना चाहिए था…ताकि इसके लाभ हानि का पता चलता । खामियाँ यदि होती तो उसे दूर किया जा सकता था …परंतु ऐसा नहीं हुआ।
🚩जज अपनी नियुक्ति खुद करे ऐसा विश्व में कहीं नहीं होता है सिवाय भारत के।
🚩क्या कुछ सीनियर IAS आॅफिसर मिलकर नये IAS कि नियुक्ति कर सकते हैं?
🚩क्या कुछ सीनियर प्रोफेसर मिलकर नये प्रोफेसर कि नियुक्ति कर सकते हैं ?
🚩यदि नहीं तो जजों कि नियुक्ति जजों द्वारा क्यों कि जानी चाहिए ?
🚩आज सुप्रीम कोर्ट एक धर्म विशेष का हिमायती बना हुआ है
🚩सुप्रीम कोर्ट गौरक्षकों को बैन करता है …सुप्रीम कोर्ट जल्लीकट्टू को बैन करता है …सुप्रीम कोर्ट दही हांडी के खिलाफ निर्णय देता है ….सुप्रीम कोर्ट दस बजे रात के बाद डांडिया बंद करवाता है …..सुप्रीम कोर्ट दीपावली में देर रात पटाखे को बैन करता है।
लेकिन ….
🚩सुप्रीम कोर्ट आतंकियों  कि सुनवाई के रात दो बजे अदालत खुलवाता है ….सुप्रीम कोर्ट पत्थरबाजी को बैन नहीं करता है….सुप्रीम कोर्ट गोमांश खाने वालों पर बैन नहीं लगाता है ….ईद – बकरीद पर कुर्बानी को बैन नहीं करता है …..मुस्लिम महिलाओं के शोषण के खिलाफ तीन तलाक को बैन नहीं करता है।
🚩और कल तो सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ तक कह दिया कि तीन तलाक का मुद्दा यदि मजहब का है तो वह हस्तक्षेप नहीं करेगा। ये क्या बात हुई ?
🚩आधी मुस्लिम आबादी कि जिंदगी नर्क बनी हुई है और आपको यह मुद्दा मजहबी दिखता है ? धिक्कार है आपके उपर ….।
🚩अभिषेक मनु सिंघवी के विडियो को सोशल मीडिया , यू ट्यूब से हटाने का आदेश देते हो कि न्यायपालिका कि बदनामी ना हो ? ….पर क्यों ऐसा ? …क्यों छुपाते हो अपनी कमजोरी ?
🚩जस्टिस कर्णन जैसे पागल और टूच्चे जजों को नियुक्त करके  एवं बाद में छः माह के लिए कैद कि सजा सुनाने कि सुप्रीम कोर्ट को आवश्यकता क्यों पड़नी चाहिए ?
अभिषेक मनु सिंघवी जैसे अय्याशों को जजों की नियुक्ति का अधिकार क्यों मिलना चाहिए ?
🚩क्या सुप्रीम कोर्ट जवाब देगा ..?????
https://goo.gl/RVMSYw
🚩लोग अब तक सुप्रीम कोर्ट कि इज्जत करते आए हैं कहीं ऐसा ना हो कि जनता न्यायपालिका के विरुद्ध अपना उग्र रूप धारण कर लें उसके पहले उसे अपनी समझ दुरुस्त कर लेनी चाहिए। सत्तर सालों से चल रही दादागीरी अब बंद करनी पड़ेगी .. यह “लोकतंत्र” है और “जनता”  ही इसका “मालिक” है। संदर्भ : जनार्दन मिश्रा
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जानिए, मां गंगा की उत्पति कैसे हुई और पृथ्वी पर क्यों लाई गई

गंगा दशहरा प्रारम्भ : 16 मई, समाप्त 24 मई
🚩गंगा नदी उत्तर भारतकी केवल जीवनरेखा नहीं, अपितु हिंदू धर्मका सर्वोत्तम तीर्थ है । ‘आर्य सनातन वैदिक संस्कृति’ गंगाके तटपर विकसित हुई, इसलिए गंगा हिंदुस्थानकी राष्ट्ररूपी अस्मिता है एवं भारतीय संस्कृतिका मूलाधार है । इस कलियुगमें श्रद्धालुओंके पाप-ताप नष्ट हों, इसलिए ईश्वरने उन्हें इस धरापर भेजा है । वे प्रकृतिका बहता जल नहीं; अपितु सुरसरिता (देवनदी) हैं । उनके प्रति हिंदुओंकी आस्था गौरीशंकरकी भांति सर्वोच्च है । गंगाजी मोक्षदायिनी हैं; इसीलिए उन्हें गौरवान्वित करते हुए पद्मपुराणमें (खण्ड ५, अध्याय ६०, श्लोक ३९) कहा गया है, ‘सहज उपलब्ध एवं मोक्षदायिनी गंगाजीके रहते विपुल धनराशि व्यय (खर्च) करनेवाले यज्ञ एवं कठिन तपस्याका क्या लाभ ?’ नारदपुराणमें तो कहा गया है, ‘अष्टांग योग, तप एवं यज्ञ, इन सबकी अपेक्षा गंगाजीका निवास उत्तम है । गंगाजी भारतकी पवित्रताकी सर्वश्रेष्ठ केंद्रबिंदु हैं, उनकी महिमा अवर्णनीय है ।’
🚩मां गंगा का #ब्रह्मांड में उत्पत्ति
Know how the mother Ganga originated
and brought it to the earth
🚩‘वामनावतारमें श्रीविष्णुने दानवीर बलीराजासे भिक्षाके रूपमें तीन पग भूमिका दान मांगा । राजा इस बातसे अनभिज्ञ था कि श्रीविष्णु ही वामनके रूपमें आए हैं, उसने उसी क्षण वामनको तीन पग भूमि दान की । वामनने विराट रूप धारण कर पहले पगमें संपूर्ण पृथ्वी तथा दूसरे पगमें अंतरिक्ष व्याप लिया । दूसरा पग उठाते समय वामनके ( #श्रीविष्णुके) बाएं पैरके अंगूठेके धक्केसे ब्रह्मांडका सूक्ष्म-जलीय कवच (टिप्पणी १) टूट गया । उस छिद्रसे गर्भोदककी भांति ‘ब्रह्मांडके बाहरके सूक्ष्म-जलनेब्रह्मांडमें प्रवेश किया । यह सूक्ष्म-जल ही गंगा है ! गंगाजीका यह प्रवाह सर्वप्रथम सत्यलोकमें गया ।ब्रह्मदेवने उसे अपने कमंडलु में धारण किया । तदुपरांत सत्यलोकमें ब्रह्माजीने अपने कमंडलुके जलसे श्रीविष्णुके चरणकमल धोए । उस जलसे गंगाजीकी उत्पत्ति हुई । तत्पश्चात गंगाजी की यात्रा सत्यलोकसे क्रमशः #तपोलोक, #जनलोक, #महर्लोक, इस मार्गसे #स्वर्गलोक तक हुई ।
🚩पृथ्वी पर उत्पत्ति
🚩 #सूर्यवंशके राजा सगरने #अश्वमेध यज्ञ आरंभ किया । उन्होंने दिग्विजयके लिए यज्ञीय अश्व भेजा एवं अपने 60 सहस्त्र (हजार) पुत्रोंको भी उस अश्वकी रक्षा हेतु भेजा । इस यज्ञसे भयभीत इंद्रदेवने यज्ञीय अश्वको कपिलमुनिके आश्रमके निकट बांध दिया । जब सगरपुत्रोंको वह अश्व कपिलमुनिके आश्रमके निकट प्राप्त हुआ, तब उन्हें लगा, ‘कपिलमुनिने ही अश्व चुराया है ।’ इसलिए सगरपुत्रोंने ध्यानस्थ कपिलमुनिपर आक्रमण करनेकी सोची । कपिलमुनिको अंतर्ज्ञानसे यह बात ज्ञात हो गई तथा अपने नेत्र खोले । उसी क्षण उनके नेत्रोंसे प्रक्षेपित तेजसे सभी सगरपुत्र भस्म हो गए । कुछ समय पश्चात सगरके प्रपौत्र राजा अंशुमनने सगरपुत्रोंकी मृत्युका कारण खोजा एवं उनके उद्धारका मार्ग पूछा । कपिलमुनिने अंशुमनसे कहा, ‘`गंगाजीको स्वर्गसे भूतलपर लाना होगा । सगरपुत्रोंकी अस्थियोंपर जब गंगाजल प्रवाहित होगा, तभी उनका उद्धार होगा !’’ मुनिवरके बताए अनुसार गंगाको पृथ्वीपर लाने हेतु अंशुमनने तप आरंभ किया ।’  ‘अंशुमनकी मृत्युके पश्चात उसके सुपुत्र राजा दिलीपने भी गंगावतरणके लिए तपस्या की । #अंशुमन एवं दिलीपके सहस्त्र वर्ष तप करनेपर भी गंगावतरण नहीं हुआ; परंतु तपस्याके कारण उन दोनोंको स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ।’ (वाल्मीकिरामायण, काण्ड १, अध्याय ४१, २०-२१)
🚩‘राजा दिलीपकी #मृत्युके पश्चात उनके पुत्र राजा भगीरथने कठोर तपस्या की । उनकी इस तपस्यासे प्रसन्न होकर गंगामाताने भगीरथसे कहा, ‘‘मेरे इस प्रचंड प्रवाहको सहना पृथ्वीके लिए कठिन होगा । अतः तुम भगवान शंकरको प्रसन्न करो ।’’ आगे भगीरथकी घोर तपस्यासे भगवान शंकर प्रसन्न हुए तथा भगवान शंकरने गंगाजीके प्रवाहको जटामें धारण कर उसे पृथ्वीपर छोडा । इस प्रकार हिमालयमें अवतीर्ण गंगाजी भगीरथके पीछे-पीछे #हरद्वार, प्रयाग आदि स्थानोंको पवित्र करते हुए बंगालके उपसागरमें (खाडीमें) लुप्त हुईं ।’
🚩ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, भौमवार (मंगलवार) एवं हस्त नक्षत्रके शुभ योगपर #गंगाजी स्वर्गसे धरतीपर अवतरित हुईं ।  जिस दिन #गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं वह दिन ‘गंगा दशहरा’ के नाम से जाना जाता है ।
🚩जगद्गुरु आद्य शंकराचार्यजी, जिन्होंने कहा है : एको ब्रह्म द्वितियोनास्ति । द्वितियाद्वैत भयं भवति ।। उन्होंने भी ‘गंगाष्टक’ लिखा है, गंगा की महिमा गायी है । रामानुजाचार्य, रामानंद स्वामी, चैतन्य महाप्रभु और स्वामी रामतीर्थ ने भी गंगाजी की बड़ी महिमा गायी है । कई साधु-संतों, अवधूत-मंडलेश्वरों और जती-जोगियों ने गंगा माता की कृपा का अनुभव किया है, कर रहे हैं तथा बाद में भी करते रहेंगे ।
🚩अब तो विश्व के #वैज्ञानिक भी गंगाजल का परीक्षण कर दाँतों तले उँगली दबा रहे हैं ! उन्होंने दुनिया की तमाम नदियों के जल का परीक्षण किया परंतु गंगाजल में रोगाणुओं को नष्ट करने तथा आनंद और सात्त्विकता देने का जो अद्भुत गुण है, उसे देखकर वे भी आश्चर्यचकित हो उठे ।
🚩 #हृषिकेश में स्वास्थ्य-अधिकारियों ने पुछवाया कि यहाँ से हैजे की कोई खबर नहीं आती, क्या कारण है ? उनको बताया गया कि यहाँ यदि किसीको हैजा हो जाता है तो उसको गंगाजल पिलाते हैं । इससे उसे दस्त होने लगते हैं तथा हैजे के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है । वैसे तो हैजे के समय घोषणा कर दी जाती है कि पानी उबालकर ही पियें । किंतु गंगाजल के पान से तो यह रोग मिट जाता है और केवल हैजे का रोग ही मिटता है ऐसी बात नहीं है, अन्य कई रोग भी मिट जाते हैं । तीव्र व दृढ़ श्रद्धा-भक्ति हो तो गंगास्नान व गंगाजल के पान से जन्म-मरण का रोग भी मिट सकता है ।
🚩सन् 1947 में जलतत्त्व विशेषज्ञ कोहीमान भारत आया था । उसने वाराणसी से #गंगाजल लिया । उस पर अनेक परीक्षण करके उसने विस्तृत लेख लिखा, जिसका सार है – ‘इस जल में कीटाणु-रोगाणुनाशक विलक्षण शक्ति है ।’
🚩दुनिया की तमाम #नदियों के जल का विश्लेषण करनेवाले बर्लिन के डॉ. जे. ओ. लीवर ने सन् 1924 में ही गंगाजल को विश्व का सर्वाधिक स्वच्छ और #कीटाणु-रोगाणुनाशक जल घोषित कर दिया था ।
🚩‘आइने अकबरी’ में लिखा है कि ‘अकबर गंगाजल मँगवाकर आदरसहित उसका पान करते थे । वे गंगाजल को अमृत मानते थे ।’ औरंगजेब और मुहम्मद तुगलक भी गंगाजल का पान करते थे । शाहनवर के नवाब केवल गंगाजल ही पिया करते थे ।
🚩कलकत्ता के हुगली जिले में पहुँचते-पहुँचते तो बहुत सारी नदियाँ, झरने और नाले गंगाजी में मिल चुके होते हैं । अंग्रेज यह देखकर हैरान रह गये कि हुगली जिले से भरा हुआ गंगाजल दरियाई मार्ग से यूरोप ले जाया जाता है तो भी कई-कई दिनों तक वह बिगड़ता नहीं है । जबकि यूरोप की कई बर्फीली नदियों का पानी हिन्दुस्तान लेकर आने तक खराब हो जाता है ।
🚩अभी रुड़की विश्वविद्यालय के #वैज्ञानिक कहते हैं कि ‘गंगाजल में जीवाणुनाशक और हैजे के कीटाणुनाशक तत्त्व विद्यमान हैं ।’
🚩फ्रांसीसी चिकित्सक हेरल ने देखा कि गंगाजल से कई रोगाणु नष्ट हो जाते हैं । फिर उसने गंगाजल को कीटाणुनाशक औषधि मानकर उसके इंजेक्शन बनाये और जिस रोग में उसे समझ न आता था कि इस रोग का कारण कौन-से कीटाणु हैं, उसमें गंगाजल के वे इंजेक्शन रोगियों को दिये तो उन्हें लाभ होने लगा !
🚩संत #तुलसीदासजी कहते हैं :
गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ।।
(श्रीरामचरित. अयो. कां. : 86.2)
🚩सभी सुखों को देनेवाली और सभी शोक व दुःखों को हरनेवाली माँ गंगा के तट पर स्थित तीर्थों में पाँच तीर्थ विशेष आनंद-उल्लास का अनुभव कराते हैं : गंगोत्री, हर की पौड़ी (हरिद्वार),  #प्रयागराज त्रिवेणी, काशी और #गंगासागर । #गंगादशहरे के दिन गंगा में गोता मारने से सात्त्विकता, प्रसन्नता और विशेष पुण्यलाभ होता है ।
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राष्ट्र एवं धर्मके लिए आत्मबलिदान करनेवाले संभाजी महाराज का महान इतिहास जानिए

14 May 2018
संभाजीराजाने अपनी अल्पायुमें जो अलौकिक कार्य किए, उससे पूरा हिंदुस्थान प्रभावित हुआ । इसलिए प्रत्येक हिंदुको उनके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए । उन्होंने साहस एवं निडरताके साथ औरंगजेबकी आठ लाख सेनाका सामना किया तथा अधिकांश मुगल सरदारोंको युद्धमें पराजित कर उन्हें भागनेके लिए विवश कर दिया । २४ से ३२ वर्षकी आयुतक शंभूराजाने मुगलोंकी पाश्विक शक्तिसे लडाई की एवं एक बार भी यह योद्धा पराजित नहीं हुआ । इसलिए औरंगजेब दीर्घकाल तक महाराष्ट्रमें युद्ध करता रहा । उसके दबावसे संपूर्ण उत्तर हिंदुस्थान मुक्त रहा । इसे संभाजी महाराजका सबसे बडा कार्य कहना पडेगा । यदि उन्होंने औरंगजेबके साथ समझौता किया होता अथवा उसका आधिपत्य स्वीकार किया होता तो,  वह दो-तीन वर्षोंमें ही पुन: उत्तर हिंदुस्थानमें आ धमकता; परंतु संभाजी राजाके संघर्षके कारण औरंगजेबको २७ वर्ष दक्षिण भारतमें ही रुकना पडा । इससे उत्तरमें बुंदेलखंड, पंजाब और राजस्थानमें हिंदुओंकी नई सत्ताएं स्थापित होकर हिंदु समाजको सुरक्षा मिली ।
 स्वराज्यका दूसरा छत्रपति 
Know the great history of Sambhaji Maharaj
who sacrificed himself for nation and religion
ज्येष्ठ शुद्ध १२ शके १५७९, गुरुवार दि. १४ मई १६५७ को पुरंदरगढपर स्वराज्यके दूसरे छत्रपतिका जन्म हुआ । शंभूराजाके जन्मके दो वर्ष पश्चात सईबाईकी मृत्यु हो गई एवं राजा मातृसुखसे वंचित हो गए । परंतु जिजाऊने इस अभावकी पूर्ति की । जिस जिजाऊने शिवबाको तैयार किया, उसी जिजाऊने संभाजी राजापर भी संस्कार किए । संभाजीराजे शक्तिसंपन्नता एवं रूपसौंदर्यकी प्रत्यक्ष प्रतिमा ही थे !
विश्वके प्रथम बालसाहित्यकार !
१४ वर्षकी आयुतक बुधभूषणम् (संस्कृत), नायिकाभेद, सातसतक, नखशिख (हिंदी) इत्यादि ग्रंथोंकी रचना करनेवाले संभाजीराजे विश्वके प्रथम बालसाहित्यकार थे । मराठी, हिंदी, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी, कन्नड आदि भाषाओंपर उनका प्रभुत्व था । जिस तडपसे उन्होंने लेखनी चलाई, उसी तडपसे उन्होंने तलवार भी चलाई ।
धर्मपरिवर्तनके विरोधमें छत्रपति संभाजी महाराजकी कठोर नीति !
‘मराठों एवं अंग्रेजोंमें १६८४ में जो समझौता हुआ, उसमें छत्रपति संभाजी महाराजने एक ऐसी शर्त रखी थी कि अंग्रेजोंको मेरे राज्यमें दास(गुलाम) बनाने अथवा ईसाई धर्ममें कलंकित करने हेतु लोगोंका क्रय करनेकी अनुज्ञा नहीं मिलेगी’ (संदर्भ : ‘शिवपुत्र संभाजी’, लेखिका – डॉ. (श्रीमती) कमल गोखले)
हिंदुओंके शुद्धीकरणके लिए निरंतर सजग रहनेवाले संभाजीराजा
संभाजी महाराजजीने ‘शुद्धीकरणके लिए’ अपने राज्यमें स्वतंत्र विभागकी स्थापना की थी । छत्रपति संभाजी महाराज एवं कवि कलशने बलपूर्वक धर्मपरिवर्तन कर मुसलमान बनाए गए हरसुलके ब्राह्मण गंगाधर कुलकर्णीको शुद्ध कर पुनः हिंदु धर्ममें परिवर्तित करनेका साहस दिखाया । (यह एक साहस ही था; क्योंकि उस समय ऐसे हिंदुओंको पुनः अपने धर्ममें  लेनेके लिए हिंदुओंद्वारा ही अत्यधिक विरोध होता था । इसलिए गंगाधरको त्र्यंबकेश्वर भेजकर वहांकी प्रायश्चित्त विधि पूरी करा ली गई । उसे  शुद्धिपत्र देकर अपनी पंक्तिमें भोजनके लिए बिठाकर पुनर्प्रवेश करा लिया गया ।)’ संभाजीराजाजीकी इस उदारताके कारण बहुतसे हिंदु पुनः स्वधर्ममें आ गए !
पोर्तुगीजोंकी नाकमें दम करनेवाले छत्रपति संभाजी महाराज !
फोंडाका गढ पोर्तुगीज-मराठा सीमापर था । गोवाकी पोर्तुगीज सत्ताको उकसाने तथा उस सत्ताको पूरी तरहसे उखाडनेके लिए घेरा देनेका जो प्रयास छत्रपति शिवाजी महाराजने किया था, उसमें फोंडा गढ एक महत्त्वपूर्ण दुवा था । उसका नाम था ‘मर्दनगढ’ । पोर्तुगीजोंने मर्दनगढके तटपर तोपोंका वर्षाव  चालू रखा । तटमें और एक दरार पडी । ९ नवंबरको पोर्तुगीजोंने घाटीसे अंदर प्रवेश करनेका षडयंत्र रचा । उस समय संभाजी महाराज राजापुरमें थे । उनका ध्यान इस लडाईपर केंद्रित था । महाराजने फोंडाके मोरचेपर स्वयं उपस्थित रहनेका निश्चय किया । वे शीघ्रतासे फोंडा पहुंचे । उनका हठ एवं ईर्ष्या इतनी दुर्दम्य थी कि उन्होंने ८०० सवारोंकी सुरक्षामें ६०० पैदल सैनिकोंको भली-भांति किलेमें पहुंचाया । पोर्तुगीज उनके धैर्य एवं निडर मानसिकताको देखते ही रह गए । उन्हें उनपर आक्रमण करनेका भान भी नहीं रहा ।
संभाजी महाराज युद्धमें सम्मिलित हुए, यह देखते ही वाइसरॉयने अपने मनमें ऐसा पक्का निश्चय किया कि यह युद्ध उसे बहुत महंगा पडेगा । महाराजकी उपस्थिति देखकर मराठोंको होश आया । किल्लेदार येसाजी कंक छत्रपति शिवाजी महाराजके समयका योद्धा था । अब वह वृद्ध हो चुका था; परंतु उसमें युवकको हटानेकी शूरता, धीरता एवं सुदृढता थी । इस वृद्ध युवकने पराक्रमकी पराकाष्ठा की । उसने अपने लडके कृष्णाजीके साथ चुनिंदे सिपाहियोंको साथ लेकर गढके बाहर जाकर पोर्तुगीजोंसे लडाई की । जिनके साथ वे लडे, उनको उन्होंने पूरी तरह पराजित किया; परंतु इस मुठभेडमें येसाजी एवं उनके सुपुत्र कृष्णाजीको भयानक चोट लगी ।  १० नवंबरको पोर्तुगीजोंने लौटना आरंभ किया । मराठोंने उनपर छापे मारकर उन्हें अत्यधिक परेशान किया । तोप तथा बंदूकोंको पीछे छोडकर उन्हें पलायन करना पडा । उन्होंने चावलके ३०० बोरे एवं २०० गधोंपर रखने जितना साहित्य पीछे छोडा ।
पोर्तुगीज-मराठा संघर्ष अंततक चालू ही रहा !
छत्रपति संभाजीराजाकी मृत्युतक पोर्तुगीज एवं छत्रपति संभाजीराजे दोनोंमें युद्ध चालू रहा । तबतक मराठोंने पोर्तुगीजके नियंत्रणमें रहनेवाला जो प्रदेश जीत लिया था, उसका बहुतसा अंश मराठोंके नियंत्रणमें था । गोवाके गवर्नर द रुद्रिगु द कॉश्त २४.१.१६८८ को पोर्तुगालके राजाको लिखते हैं : ‘…छत्रपति संभाजीराजासे चल रहा युद्ध अबतक समाप्त नहीं हुआ । यह युद्ध वाइसरॉय कॉट द आल्वेरके राज्यकालमें आरंभ हुआ था ।’
 
बहनोई गणोजी शिर्के की बेईमानी एवं मुगलोंद्वारा संभाजीराजाका घेराव !
येसुबाईके वरिष्ठ बंधु अर्थात शंभूराजाके बहनोई, गणोजी शिर्के हिंदवी स्वराज्यसे बेईमान हो गए । जुल्पिकार खान रायगढपर आक्रमण करने आ रहा है यह समाचार मिलते ही शंभूराजा सातारा-वाई-महाड मार्गसे होते हुए रायगढ लौटनेवाले थे; परंतु मुकर्रबखान कोल्हापुरतक आ पहुंचा । इसलिए शंभूराजाने संगमेश्वर मार्गके चिपलन-खेड मार्गसे रायगढ जानेका निश्चय किया । शंभूराजेके स्वयं संगमेश्वर आनेकी वार्ता आसपासके क्षेत्रमें हवासमान फैल गई । शिर्केके दंगोंके कारण उद्ध्वस्त लोग अपने परिवाद लेकर संभाजीराजाके पास आने लगे । जनताके परिवादको समझकर उनका समाधान करनेमें उनका समय व्यय हो गया एवं संगमेश्वरमें ४-५ दिनतक निवास करना पडा । उधर राजाको पता चला कि कोल्हापुरसे मुकर्रबखान निकलकर आ रहा है । कोल्हापुर से संगमेश्वरकी दूरी ९० मीलकी तथा वह भी सह्याद्रिकी घाटीसे व्याप्त कठिन मार्ग था ! इसलिए न्यूनतम ८-१० दिनके अंतरवाले संगमेश्वरको बेईमान गणोजी शिर्केने मुकर्रबखानको समीपके मार्गसे केवल ४-५ दिनमें ही लाया । संभाजीसे प्रतिशोध लेनेके उद्देश्यसे शिर्केने बेईमानी की थी तथा अपनी जागीर प्राप्त करने हेतु यह कुकर्म किया । अतः १ फरवरी १६८९ को मुकर्रबखानने अपनी ३ हजार सेनाकी सहायतासे शंभूराजाको घेर लिया ।
संभाजीराजाका घेरा तोडनेका असफल प्रयास !
जब शंभूराजेके ध्यानमें आया कि संगमेश्वरमें जिस सरदेसाईके बाडेमें वे निवासके लिए रुके थे, उस बाडेको खानने घेर लिया, तो उनको आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि इतने अल्प दिनोंमें खानका वहां आना असंभव था; परंतु यह चमत्कार केवल बेईमानीका था, यह भी उनके ध्यानमें आया । शंभूराजाने पूर्वसे ही अपनी फौज रायगढके लिए रवाना की थी तथा केवल ४००-५०० सैन्य ही अपने पास रखे थे । अब खानका घेराव तोडकर रायगढकी ओर प्रयाण करना राजाके समक्ष एकमात्र यही पर्याय शेष रह गया था; इसलिए राजाने अपने सैनिकोंको शत्रुओंपर आक्रमण करनेका आदेश दिया । इस स्थितिमें भी शंभुराजे, संताजी घोरपडे एवं खंडोबल्लाळ बिना डगमगाए शत्रुका घेराव तोडकर रायगढकी दिशामें गतिसे निकले । दुर्भाग्यवश इस घमासान युद्धमें मालोजी घोरपडेकी मृत्यु हो गई; परंतु संभाजीराजे एवं कवि कलश घेरावमें फंसगए । इस स्थितिमें भी संभाजीराजाने अपना घोडा घेरावके बाहर निकाला था; परंतु पीछे रहनेवाले कवि कलशके दाहिने हाथमें मुकर्रबखानका बाण लगनेसे वे नीचे गिरे एवं उन्हें बचाने हेतु राजा पुनः पीछे मुडे तथा घेरावमें फंस गए ।
अपनोंकी बेइमानीके कारण राजका घात !
इस अवसरपर अनेक सैनिकोंके मारे जानेके कारण उनके घोडे इधर-उधर भाग रहे थे । सर्वत्र धूल उड रही थी । किसीको भी  स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था । इसका लाभ उठाकर शंभूराजाने पुनः सरदेसाईके बाडेमें प्रवेश किया । वहांपर मात्र उनका घोडा था । धूल स्थिर होनेपर गणोजी शिर्केने शंभूराजाके घोडेको पहचान लिया; क्योंकि राजाओंके घोडेके पांवमें सोनेका तोडा रहता था, यह शिर्केको ज्ञात था; इसलिए उन्होंने खानकी सेनाको समीपमें ही संभाजीको ढूंढनेकी सूचना की । अंततोगत्वा मुकर्रबखानके लडकेने अर्थात इरवलासखानने शंभूराजाको नियंत्रणमें ले लिया । अपनोंकी बेईमानीके कारण अंतमें सिंहका शावक शत्रुके हाथ लग ही गया । जंग जंग पछाडकर भी निरंतर ९ वर्षोंतक जो सात लाख सेनाके हाथ नहीं लगा, जिसने बादशाहको कभी स्वस्थ नहीं बैठने दिया, ऐसा पराक्रमी योद्धा अपने लोगोंकी बेईमानीके कारण मुगलोंके जालमें फंस गया ।
शंभुराजाको देखनेके लिए मुगलसेना आतुर !
संगमेश्वर से बहादुरगढकी दूरी लगभग २५० मीलकी है; परंतु मुकर्रबखानने मराठोंके भयसे केवल १३ दिनोंमें यह दूरी पार की एवं १५ फरवरी १६८९ को शंभूराजे तथा कवि कलशको लेकर वह बहादुरगढमें प्रवेश किया । पकडे गए संभाजीराजा कैसे दिखाई देते हैं, यह देखनेके लिए मुगल सेना उत्सुक हो गई थी । औरंगजेबकी छावनी अर्थात बाजार बुणगोंका विशाल नगर ही था । छावनीका घेरा ३० मीलका था, जिसमें ६० सहस्र घोडे, ४ लाख पैदल, ५० सहस्र ऊंट, ३ सहस्र हाथी, २५० बाजारपेठ तथा जानवर कुल मिलाकर ७ लाख अर्थात बहुत बडी सेना थी । इसके पश्चात भी आयुके २४ वें से ३२ वें वर्षतक शंभुराजाने मुगलोंकी पाश्विक शक्तिसे लडाई की तथा यह योद्धा एक बार भी पराजित न होनेवाला था ।
प्रखर हिंदु धर्माभिमानी छत्रपति संभाजीराजा
शंभुराजाको जेरबंद किए जानेपर अनादर सहन करना
मुकर्रबखानने शंभुराजा एवं कवि कलशको जेरबंद कर हाथीपर बांधा । संभाजीराजाजीका, विदुषककी वेश-भूषामें, उस समय चित्रकारद्वारा बनाया गया चित्र हाथ पैरोंको लकडीमें फंसाकर रक्तरंजित अवस्थामें, अहमदनगरके संग्रहालयमें आज भी देखा जा सकता है । असंख्य यातनाएं सहनेवाले यह हिंदु राजा चित्रमें अत्यंत क्रोधित दिखाई देते हैं । संभाजीराजाजीके स्वाभिमानका परिचय इस क्रोधित भाव भंगिमासे ज्ञात होता है ।
परिणामोंकी चिंता न करते हुए बादशाहके समक्ष नतमस्तक न होना
जिस समय धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज एवं कवि कलशको लेकर मुकर्रबखान छावनीके पास आया, उस समय औरंगजेबने उसके स्वागतके लिए सरदारखानको भेजा । संभाजी महाराज वास्तवमें पकडे गए, यह देखकर बादशाहको अत्यानंद हुआ । अल्लाके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु बादशहा तख्तसे नीचे उतरा एवं घुटने टेककर ‘रूकता’ कहने लगा । कवि कलश बाजूमें ही खडे थे । यह दृष्य देखकर शीघ्र ही कवि कलशने एक काव्य कहा,
यावन रावन की सभा संभू बंध्यो बजरंग ।
लहू लसत सिंदूरसम खुब खेल्यो रनरंग ।।
जो रवि छवि लछत ही खद्योत होत बदरंग ।
त्यो तुव तेज निहारी ते तखत त्यज्यो अवरंग ।।
अर्थ : जिस प्रकार रावणकी सभामें हनुमानजीको लाया गया था, उसीप्रकार संभाजीराजाको औरंगजेबके समक्ष उपस्थित किया गया है । जैसे हनुमानजीकी देहपर सिंदुर शोभित होता है, वैसे ही भीषण युद्धमें देह रक्तसे सन गई है । इसलिए हे राजन, तुझे यह सुशोभित कर रहा है । जिसप्रकार सूरजको देखते ही जुगनूका प्रकाश नष्ट होता है, उसीप्रकार तेरा तेज देखकर औरंगजेबने अपने सिंहासनका त्याग किया है । इस कवितासे अपमानित होकर औरंगजेबने कवि कलशकी जीभ काटनेकी आज्ञा दी ।
बादशाहके समक्ष खडा करनेपर इखलासखानद्वारा बार बार अभिवादन करनेको कहनेपर भी शंभु राजाने तनिक भी गर्दन नहीं हिलाई एवं बादशहाको थोडा भी महत्त्व नहीं दिया । इसके विपरीत वे संतप्त होकर बादशाहकी ओर देख रहे थे । संतप्त बादशाहने उन्हें उसी अवस्थामें कारागृहमें डालनेका आदेश दिया ।
शंभुराजा एवं कवि कलशद्वारा शारीरिक एवं मानसिक यातनाएं सहन करना
शंभूराजा एवं कवि कलशकी आंखोंमें तपती सलाखें घुमाकर उनकी आंखें फोडी गई । तत्पश्चात दोनोकी जिह्वाएं काटी गई । उस दिनसे दोनोंने अन्न-जलका त्याग किया । मुसलमानी सत्ताओंकी परंपराके अनुसार यह कोई नई बात नहीं थी । उनको अत्यंत क्रूरता एवं निर्दयतासे शत्रुका नाश करनेकी धर्माज्ञा ही है; परंतु एक स्वतंत्र राजाको ऐसी ही क्रूर पद्धतिसे हलाहल करना अमानवीयताकी चरमसीमा है । यह घटना १७.२.१६८९ को घटी ।
तदुपरांत कविराजाके हाथ, पांव ऐसे एकएक अवयव तोडे गए एवं वे रक्तमांस नदीके किनारेपर फेंके गए । पंधरा मैलकी परिधिमें फैले इस बादशाहके तलपर अत्यधिक सन्नाटा फैला था । कवि कलशको हलाहल कर मारे जानेका समाचार सर्वत्र फैल गया था । मानों कवि कलशपर होनेवाले अत्याचार शंभुराजापर किए जानेवाले प्रत्येक अत्याचारका पूर्व प्रयोग ही होता था !
शंभुराजाको पक्के खंबेसे बांधा गया । दो बलवान राक्षसोंने शंभुराजाके शरीरमें बाघनख घुसाकर उनकी त्वचा टरटर फाड दी । चमडी छिली जा रही थी तथा टूटने लगी थी । शंभुराजाने प्राण बचानेके लिए क्रंदन नहीं किया; परंतु दांतसे दांत दबाकर वे उस अत्याचारको सहन करनेका प्रयास कर रहे थे । राजाका फाडा गया जीवित शरीर स्थानपर ही थडथड उड रहा था ।
अत्यधिक छल सहन कर इस्लाम न स्वीकारते
हुए आत्मबलिदान करनेवाले संभाजीराजाका अलौकिक सामर्थ्य !
संभाजीराजाने धर्मपरिवर्तन करना अस्वीकार किया; इसलिए औरंगजेबने संभाजी राजाके साथ अनगिनत छल किए । उनकी आंखोंमें मिर्च डाली । एकएक अवयव तोडे, उसमें नमक डाला, तो भी संभाजीराजाने हिंदु धर्मका त्याग नहीं किया । संभाजीराजामें मृत्युको भी लज्जा आने समान अत्यंत अलौकिक सामर्थ्य उस्फूर्त रूपसे अभिव्यक्त हुआ ।
 इतिहासमें धर्मके लिए अमर होनेवाले संभाजीराजा
अंतमें औरंगजेबने राजाजीकी आंखें फोड डालीं, जीभ काट दी, फिर भी राजाजीको मृत्यु स्पर्श न कर सकी । दुष्ट मुगल सरदारोंने उनको कठोर यातनाएं दीं । उनके अद्वितीय धर्माभिमानके कारण यह सब सहन करना पडा । १२ मार्च १६८९को गुढी पाडवा (नववर्षारंभ) था । हिंदुओंके त्यौहारके दिन उनका अपमान करनेके लिए ११ मार्च फाल्गुन अमावस्याके दिन संभाजीराजाजीकी हत्या कर दी गई । उनका मस्तक भालेकी नोकपर लटकाकर उसे सर्व ओर घुमाकर मुगलोंने उनका अत्यधिक अपमान किया । इस प्रकार पहली फरवरीसे ग्यारह मार्च तक ३९ दिन यमयातना सहन कर संभाजीराजाजीने हिंदुत्वके तेजको बढाया । धर्मके लिए अपने प्राणोंको न्योछावर करनेवाले, हिंदवी स्वराज्यका विस्तार कर पूरे हिंदुस्थानमें भगवा ध्वज फहरानेकी इच्छा रखनेवाले संभाजीराजा इतिहासमें अमर हो गए । औरंगजेब इतिहासमें राजधर्मको पैरों तले रौंदनेवाला अपराधी बन गया ।
संभाजीराजाजीके बलिदानके पश्चात महाराष्ट्रमें क्रांति हुई
संभाजीराजाजीके बलिदानके कारण महाराष्ट्र उत्तेजित हो उठा । पापी औरंगजेबके साथ मराठोंका निर्णायक संघर्ष आरंभ हुआ । ‘पत्ते-पत्तेकी तलवार बनी और घर-घर किला बन गया, घर-घरकी माताएं, बहनें अपने पतियोंको राजाजीके बलिदानका प्रतिशोध लेनेको कहने लगीं’ इसप्रकार उस कालका सत्य वर्णन किया गया है । संभाजीराजाजीके बलिदानके कारण मराठोंका स्वाभिमान पुन: जागृत हुआ, महारानी येसुबाई, तारारानी, संताजी घोरपडे, धनाजी जाधव, रामचंद्रपंत अमात्य, शंकराजी नारायण समान मराठा वीर-वीरांगनाओंका उदय हुआ । यह तीन सौ वर्ष पूर्वके राष्ट्रजीवनकी अत्यंत महत्त्वपूर्ण गाथा है । इससे इतिहासको एक नया मोड मिला । जनताकी सहायता और विश्वासके कारण मराठोंकी सेना बढने लगी और सेनाकी संख्या दो लाख तक पहुंच गई । सभी ओर प्रत्येक स्तरपर मुगलोंका घोर विरोध होने लगा । अंतमें २७ वर्षके निष्फल युद्धके उपरांत औरंगजेबका अंत हुआ और मुगलोंकी सत्ता शक्ति क्षीण होने लगी एवं हिंदुओंके शक्तिशाली साम्राज्यका उदय हुआ ।
शाहीर योगेशके शब्दोमें कहना है, तो…
‘देश धरमपर मिटनेवाला शेर शिवाका छावा था ।
महापराक्रमी परम प्रतापी एक ही शंभू राजा था ।।१।।
तेजःपुंज तेजस्वी आंखें निकल गई पर झुका नहीं ।
दृष्टि गई पर राष्ट्रोन्नतिका दिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं ।।२।।
दोनों पैर कटे शंभूके ध्येय मार्गसे हटा नहीं ।
हाथ कटे तो क्या हुआ सत्कर्म कभी भी छूटा नहीं ।।३।।
जिह्वा काटी रक्त बहाया धरमका सौदा किया नहीं ।।
शिवाजीका ही बेटा था वह गलत राहपर चला नहीं ।।४।।
रामकृष्ण, शालिवाहनके पथसे विचलित हुआ नहीं ।।
गर्वसे हिंदु कहनेमें कभी किसीसे डरा नहीं ।।
वर्ष तीन सौ बीत गए अब शंभूके बलिदानको ।
कौन जीता कौन हारा पूछ लो संसारको ।।५।।
कोटि-कोटि कंठोंमें तेरा आज गौरवगान है ।
अमर शंभू तू अमर हो गया तेरी जयजयकार है ।।६।।
भारतभूमिके चरणकमलपर जीवन पुष्प चढाया था ।
है दूजा दुनियामें कोई, जैसा शंभू राजा था ।।७।।’
– शाहीर योगेश स्त्रोत : हिन्दू जनजागृति
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