20 जनवरी को कश्‍मीरी पंडितों को काफिर करार दिया गया था..!!

20 जनवरी को कश्‍मीरी पंडितों को काफिर करार दिया गया था..!!
जानिए इतिहास!!
Azaad-Bharat-कश्‍मीरी पंडित
20 जनवरी जब-जब यह तारीख आती है, कश्‍मीरी पंडितों के जख्‍म हरे हो जाते हैं। यही वह तारीख है जिसने जम्‍मू कश्‍मीर में बसे कश्‍मीरी पंडितों को अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रहने को मजबूर कर दिया। इस तारीख ने उनके लिए जिंदगी के मायने ही बदल दिए थे।
कश्‍मीरी पंडितों को बताया काफिर!!
20 जनवरी 1999 को कश्‍मीर की मस्जिदों से कश्‍मीरी पंडितों को काफिर करार दिया गया। मस्जिदों से लाउडस्‍पीकरों के जरिए ऐलान किया गया, ‘कश्‍मीरी पंडित या तो मुसलमान धर्म अपना लें, या चले जाएं या फिर मरने के लिए तैयार रहें।’ यह ऐलान इसलिए किया गया ताकि कश्‍मीरी पंडितों के घरों को पहचाना जा सके और उन्‍हें या तो इस्‍लाम कुबूल करने के लिए मजबूर किया जाए या फिर उन्‍हें मार दिया जाए।
कश्मीरी पंडितों के सर काटे गए, कटे सर वाले शवों को चौक-चौराहों पर लटकाया गया था ।
बड़ी संख्‍या में कश्‍मीरी पंडितों ने अपने घर छोड़ दिए। आंकड़ों के मुताबिक 1990 के बाद करीब 7 लाख कश्मीरी पंडित अपने घरों को छोड़कर कश्‍मीर से विस्थापित होने को मजबूर हुए।
सरेआम हुए थे बलात्कार!!
एक कश्मीरी पंडित नर्स के साथ आतंकियों ने सामूहिक बलात्कार किया और उसके बाद मार-मार कर उसकी हत्या कर दी। घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए।
मस्जिदों में भारत एवं हिंदू विरोधी भाषण दिए जाने लगे। सभी कश्मीरियों को कहा गया कि इस्लामिक ड्रेस कोड अपनाएं।
डर की वजह से वापस लौटने से कतराते!!
आज भी कश्‍मीरी पंडितों के अंदर का डर उन्‍हें वापस लौटने से रोक देता है। कश्‍मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ने से पहले अपने घरों को कौड़‍ियों के दाम पर बेचा था। 27 वर्षों में कीमतें तीन गुना तक बढ़ गई हैं। आज अगर वह वापस आना भी चाहें तो नहीं आ सकते क्‍योंकि न तो उनका घर है और न ही घाटी में उनकी जमीन बची है। इस मौके पर अभिनेता अनुपम खेर ने एक कविता शेयर की है। आप भी देखिए अनुपम ने कैसे कश्‍मीरी पंडितों का दर्द बयां किया है।
फरीदाबाद (हरियाणा) के सेक्टर 37 स्थित कश्मीरी भवन में यूथ फॉर पनून कश्मीर तथा कश्मीरी पंडित वेलफेयर असोसिएशन द्वारा कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन हेतु विशेष कार्यक्रम का अायोजन किया गया था उसमे कर्नाटक के श्री प्रमोद मुतालिक, श्रीराम सेना (राष्ट्रिय अध्यक्ष)  ने बताया कि यह कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन का प्रश्न नहीं, तो यह पूरे भारत की समस्या है। हिंदुओं को 1990 में कश्मीर में से क्यों निकाला गया ? क्या वो कोई दंगा कर रहे थे ? या उनके घर में हथियार थे ?
उन्हें केवल इसलिए वहां से निकल दिया गया कि वो ’हिन्दू´ हैं। आज यही समस्या भारत के विविध राज्यों में उभरनी शुरू हो गई है। इसलिए आज एक भारत अभियान की आवश्यकता है।
 पू. (डॉ) चारुदत्त पिंगळे, राष्ट्रीय मार्गदर्शक, हिन्दू जनजागृति समिती ने बताया कि जिस प्रकार महाभारत के काल में भगवान श्रीकृष्ण ने 5 गांव मांगे थे किंतु कौरवों ने वो भी देने से इन्कार कर दिया था , तदुपरांत महाभारत हुआ। उसी प्रकार आज कश्मीरी हिंदुओं के लिए पूरे भारत के हिन्दुत्वनिष्ठ और राष्ट्रप्रेमी संगठन पनून कश्मीर मांग रहे हैं, परंतु आज सरकार चुप है।
कश्मीर भारत माता का मुकुट है। कश्मीर भूभाग नहीं, कश्यप ऋषि की तपोभूमि है। वहां से हिंदुओं का पलायन हुआ है, परंतु उन्हाेंने हार नहीं मानी है । कश्मीर में पनून कश्मीर और भारत हिन्दू राष्ट्र बनने तक हम कार्य करते रहेंगे यह हमारा धर्मदायित्व है ।
अधिवक्ता श्रीमती चेतना शर्मा, हिन्दू स्वाभिमान, उत्तर प्रदेश – राजनैतिक दलों ने हर जगह जाति का नाम देकर हर मामले को राजनैतिक करने का प्रयास किया है। परंतु आज समय आ गया है कि जो स्थिति जैसी है, वैसा ही सत्य रूप दुनिया के सामने लाया जाए। जब भी, जहां भी जनसांख्यिकी बदली है, वहां कश्मीर बना है। अब उत्तर प्रदेश की भी स्थिति वैसी ही होना शुरु हो गई है। कैराना में जो हुआ, वही आज उत्तर प्रदेश के बाकी क्षेत्रों में भी होने लगा है। अब मात्र 10 वर्ष में या तो भारत हिन्दू राष्ट्र होगा , या हिन्दू विहीन राष्ट्र !
ट्वीटर भी लोगों ने दी प्रतिक्रिया!!
सुरयश ने लिखा कि जम्मू कश्मीर में मुस्लिम 68% है, फिर भी अल्पसंख्यक श्रेणी का खैरात दिया जा रहा है
सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण क्यों?
देवेंद्र कुमार ने लिखा कि #KashmiriPandits को कश्मीर छोड़े 26 साल हो गए। आज भी उनकी कसक ये है कि उनको लेकर राजनीति बहुत हुई, लेकिन उनकी घर वापसी का रास्ता नहीं बना।😢😥
जीवैश्य लिखता है कि
#KashmiriPandits हम 19 जनवरी कभी नहीं भूलेंगे !भारत माता हम शर्मिन्दा है,कश्मीरी हिंदुओं के दोषी अब तक जिन्दा हैं!
भगवे वादल ने लिखा कि #KashmiriPandits विदेशी रोहिंग्या मुसलमानों के लिए कश्मीर में जगह है,पर कश्मीरी हिंदू विस्थापितों के लिए नही?
आपको बता दें कि 14 सितंबर, 1989 को बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष टिक्कू लाल टपलू की हत्या से कश्मीर में शुरू हुए आतंक का दौर समय के साथ और वीभत्स होता चला गया।
टिक्कू की हत्या के महीने भर बाद ही जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल बट को मौत की सजा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। फिर 13 फरवरी को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की निर्मम हत्या के साथ ही आतंक अपने चरम पर पहुंच गया था। उस दौर के अधिकतर हिंदू नेताओं की हत्या कर दी गई। उसके बाद 300 से अधिक हिंदू-महिलाओ और पुरुषों की आतंकियों ने हत्या की।
केंद्र सरकार कब हिंदुओं के नाम से जाने वाले हिंदुस्तान में हिंदुओं को सुरक्षित करेगी ?
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