US scientists do research, enhances memory of Sanskrit mantras

अमेरिका वैज्ञानिकों ने किया शोध, संस्कृत मंत्रों के उच्चारण से बढती है स्मरणशक्ति

January 17, 2018
भारतवासियों को पता है कि संस्कृत हमारी प्राचीन भाषा है । हिन्दुआें के धर्मग्रंथ भी इसी भाषा में है । संस्कृत को हम देववाणी भी कहते है । प्राचीन काल में शिक्षा इसी भाषा में दी जाती थी । इसलिए प्राचीन काल के लोग संस्कारी, चारित्र्यवान, शिलवान, धर्मपरायण, कर्तव्यनिष्ठ थे। परंतु जैसे ही मेकॉले की शिक्षा पद्धती भारत में आर्इ, भारतीय  महान संस्कृत को भारतवासी भुल गए ।
मेकाॅले की मॉडर्न शिक्षाप्रणाली से भारत में समाज अधोगती की आेर जाता दिखार्इ दे रहा है। जिसके परिणाम आज सभी आेर भ्रष्ठाचार, बलात्कार, व्यभीचार, घोटाले पनप रहे है । यह किसकी देन है ? आज जहां भारतीय अपनी प्राचीन संस्कृति तथा संस्कृत भाषा को पिछडापन मानकर पाश्चिमी सभ्यता को चुन रहे है, वही पश्चिमी लोग भारत की महान संस्कृती तथा संस्कृत भाषा की आेर आकर्षित हो रहे है ।
US scientists do research, enhances memory of Sanskrit mantras
विदेशी संस्कृत भाषा पर संशोधन कर रहे है एवं भारतीय संस्कृती की महानता विश्व के सामने ला रहे है । इसके कर्इ उदाहरण हमने देखे है । एेसा ही एक संशोधन आज हम देखेंगे । जिससे आपको अपने भारतीय होनेपर गर्व महसुस होगा ।
एक अमेरिकी पत्रिका में दावा किया गया है कि, वैदिक मंत्रों को याद करने से दिमाग के उसे हिस्से में बढोतरी होती है जिसका काम संज्ञान लेना है, यानी की चीजों को याद करना है ।
डॉ. जेम्स हार्टजेल नाम के न्यूरो साइंटिस्ट के इस शोध को साइंटिफिक अमेरिकन नाम के जरनल ने प्रकाशित किया है । न्यूरो साइंटिस्ट डॉ. हार्टजेल ने अपने शोध के बाद ‘द संस्कृत इफेक्ट’ नाम का टर्म तैयार किया है । वह अपने रिपोर्ट में लिखते हैं कि भारतीय मान्यता यह कहती है कि वैदिक मंत्रों का लगातार उच्चारण करने और उसे याद करने का प्रयास करने से स्मरणशक्ति और सोच बढती है । इस धारणा की जांच के लिए डॉ. जेम्स और इटली के ट्रेन्टो यूनिवर्सिटी के उनके साथी ने भारत स्थित नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर के डॉ. तन्मय नाथ और डॉ. नंदिनी चटर्जी के साथ टीम बनाई ।
द हिन्दू’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट की इस टीम ने 42 वॉलंटियर्स को चुना, जिनमें 21 प्रशिक्षित वैदिक पंडित (22 साल) थे । इन लोगों ने 7 सालों तक शुक्ला यजुर्वेद के उच्चारण में पारंगत प्राप्त की थी । ये सभी पंडित देहली के एक वैदिक विद्यालय के थे । जबकि एक कॉलेज के छात्रों में 21 को संस्कृत उच्चारण के लिए चुना गया । इस टीम ने इन सभी 42 प्रतिभागियों के ब्रेन की मैपिंग की । इसके लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया । नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर के पास मौजूद इस तकनीक से दिमाग के अलग अलग हिस्सों का आकार की जानकारी ली जा सकती है ।
टीम ने जब 21 पंडितों और 21 दूसरे वालंटियर्स के ब्रेन की मैपिंग की तो दोनों में काफी अंतर पाया गया । उन्होंने पाया कि वे छात्र जो संस्कृत उच्चारण में पारंगत थे उनके दिमाग का वो हिस्सा, जहां से याददाश्त, भावनाएं, निर्णय लेने की क्षमता नियंत्रित होती है, वो ज्यादा सघन था । इसमें ज्यादा अहम बात यह है कि दिमाग की संरचना में ये परिवर्तन तात्कालिक नहीं थे बल्कि वैज्ञानिकों के अनुसार, जो छात्र वैदिक मंत्रों के उच्चारण में पारंगत थे उनमें बदलाव लंबे समय तक रहने वाले थे । इसका अर्थ यह है कि संस्कृत में प्रशिक्षित छात्रों की याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता, अनुभूति की क्षमता लंबे समय तक कायम रहने वाली थी ।
आपको बता दे कि संस्कृत में 1700 धातुएं, 70 प्रत्यय और 80 उपसर्ग हैं, इनके योग से जो शब्द बनते हैं, उनकी #संख्या 27 लाख 20 हजार होती है। यदि दो शब्दों से बने सामासिक शब्दों को जोड़ते हैं तो उनकी संख्या लगभग 769 करोड़ हो जाती है। #संस्कृत #इंडो-यूरोपियन लैंग्वेज की सबसे #प्राचीन भाषा है और सबसे वैज्ञानिक भाषा भी है। इसके सकारात्मक तरंगों के कारण ही ज्यादातर श्लोक संस्कृत में हैं। भारत में संस्कृत से लोगों का जुड़ाव खत्म हो रहा है लेकिन विदेशों में इसके प्रति रुझाान बढ़ रहा है ।
संस्कृत ही एक मात्र साधन हैं, जो क्रमशः अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं।  इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएं ग्रहण करने में सहायता मिलती है। वैदिक ग्रंथों की बात छोड़ भी दी जाए, तो भी #संस्कृत भाषा में #साहित्य की रचना प्राचीनकाल से निरंतर होती आ रही है। संस्कृत केवल एक भाषा मात्र नहीं है, अपितु एक विचार भी है। #संस्कृत एक #भाषा मात्र नहीं, बल्कि एक #संस्कृति है और #संस्कार भी है। #संस्कृत में विश्व का #कल्याण है, #शांति है, #सहयोग है और #वसुधैव कुटुंबकम की भावना भी है ।
सभी भारतवासियों को मेकाॅले की मॉडर्न शिक्षाप्रणाली को त्याग करके संस्कृत भाषा का महत्त्व समझकर शिक्षा एवं सभी जगा उसे बढावा देने हेतु प्रयास करने का संकल्प करें।
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Christian missionaries in China were converting, government blew up church

चीन में ईसाई मिशनरियां करवा रहे थे धर्मान्तरण, सरकार ने उड़ा दिया चर्च

January 16, 2018
भारत में भले कोई कितना भी देशविरोधी काम करे उसपर कोई कार्यवाही नही होती, पर जो देशहित या हिंदुत्व की बात करता है उसपर ही कार्यवाही होती है । यहां उल्टा चलता है लेकिन चीन में ऐसा नही है जो देशविरोधी काम करता दिखता है उससे सख्ती से निपटा जाता है और उसपर तुरन्त कार्यवाही की जाती है ।
चीन की सरकार ईसाई मिशनरियों और इस्लामिक जिहादियों के प्रति बहुत सख्त हो गयी है, मस्जिदों पर तो तरह तरह के रोक है ही, और पिछले 2 साल में 5000 से ज्यादा मस्जिदों को तोड़ कर टॉयलेट और अन्य चीजें बना दी गई है, और अब चीन ने एक बड़े चर्च को डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया है
शांक्सी राज्य में चीन की सरकार ने वहां के मेगा चर्च को जिसमे 50,000 लोगों के बैठने की क्षमता थी, उसे उड़ा दिया है । इसके लिए पुलिस ने डायनामाइट का उपयोग किया है, कट्टरपंथी मिशनरियों के आतंक से परेशान होकर ही चीन ने ये फैसला किया है और डायनामाइट से चर्च को उड़ा दिया है, और जो लोग विरोध कर रहे थे उन्हें जेलों में ठूस दिया है ।
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चीनी सरकार का कहना है कि ये चर्च विदेशी पैसा ले रहा था जिससे चीन में धर्मांतरण का खेल चलाया जा रहा था साथ ही चीन विरोधी गतिविधियां भी चलाई जा रही थी, इस चर्च की जांच करी गयी और आरोप सही पाए गए यहाँ विदेशी पैसे से धर्मांतरण और राष्ट्रविरोध का खेल चल रहा था, कई सारी गिरफ्तारियां भी की गयी और पुलिस ने डायनामाइट लगाकर चर्च को उड़ा दिया है ।
चीनी सरकार का ये भी कहना है कि अन्य चर्चों पर भी उसकी नजर है और जहाँ पर भी धर्मांतरण और राष्ट्रविरोध का खेल चलेगा, वहां भी यही कार्यवाही की जाएगी, राष्ट्रविरोधियों को गिरफ्तार किया जायेगा और चर्च को उड़ा दिया जायेगा ।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन में मस्जिदें और चर्चों पर सरकार की सख्त नजर है, सिर्फ मौलानाओं पर ही नहीं चीन ईसाई मिशनरियों पर भी सख्त नजर रखता है और ऐसी कड़ी कार्यवाही करने से पीछे नहीं हटता । ( स्त्रोत : दैनिक भारत)
भारत में तो ईसाई मिशनरियां खुल्ला धर्मान्तरण करवा रही है, हिन्दू देवी-देवताओं को गालियां बोल रही है, हिन्दू साधु-संतों को जेल में भिजवा रही है, कान्वेंट स्कूलों में भारत माता की जय बोलने को मना कर रही है, मेहंदी नही लगाने देती, हिन्दू त्यौहार मनाने को मना करते है, यहाँ तक कि हिन्दू त्यौहारों पर छुट्टियां भी नही दी जाती हैं और भारत माता की जय बोलने और हिन्दू त्यौहार मनाने पर उनको स्कूल से बाहर किया जाता है फिर भी सरकार उनपर कोई कार्यवाही नही करती है ।
मीडिया में भी ईसाई मिशनरियों का भारी फंडिग रहता है इसलिए मीडिया चर्च के पादरी कितने भी दुष्कर्म करें, उनके खिलाफ नही दिखाती जबकि कोई हिन्दू साधु-संत पर झूठा आरोप भी लग जाता है तो उसपर 24 घण्टे खबरें चलाती है।
यहां कितने भी हिन्दू मन्दिर तोड़ दिए जाएं मीडिया को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन एक भी चर्च तोड़ दिया तो हल्ला मचा देती है । चीन आदि देशों में ऐसी दुर्दशा नही है केवल भारत में ही है और उसका मुख्य कारण है कि हमारे नेता वोटबैंक की लालच में ईमानदारी से अपना कर्तव्य पालन नहीं करते ।
अभी भी सरकार और जनता को सतर्क रहना चाहिए जो भी धर्मांतरण या देशविरोधी कार्य करता है उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही करनी चाहिए तभी देश की संस्कृति टिकेगी नही तो देश की संस्कृति को खतरा है ।
Jignesh Mewani's name Manusmriti and Vivek Arya's open letter on casteism

जिग्नेश मेवानी के नाम मनुस्मृति और जातिवाद पर विवेक आर्य का खुला पत्र

January 15, 2018
अपने आपको दलित नेता कहने वाले जिग्नेश मेवानी ने दिल्ली रैली में मनुस्मृति और भारतीय संविधान में से किसी एक को चुनने का प्रस्ताव दिया है। डॉ विवेक आर्य ने कहा कि मैं दावा करता हूँ कि जिग्नेश मेवानी ने अपने जीवन में कभी मनुस्मृति को पढ़ा तक नहीं है।  अन्यथा वह ऐसा निराधार प्रस्ताव कभी नहीं करता। मंच पर खड़े होकर मनुवाद और ब्राह्मणवाद के जुमले उछालना बेहद आसान हैं। मनुस्मृति के विषय में सत्य और वास्तविक ज्ञान का होना अलग बात है। उन्होंने कहा कि मैं इस लेख के माध्यम से जिग्नेश मेवानी को चुनौती देता हूँ कि वो आये और मनु क्यों गलत यह यह सिद्ध करे।
मनुस्मृति जो सृष्टि में नीति और धर्म (कानून) का निर्धारण करने वाला सबसे पहला ग्रंथ माना गया है उस को घोर जाति प्रथा को बढ़ावा देने वाला भी बताया जा रहा है। आज स्थिति यह है कि मनुस्मृति वैदिक संस्कृति की सबसे अधिक विवादित पुस्तक बना दी गई है | पूरा का पूरा दलित आन्दोलन  मनुवाद’ के विरोध पर ही खड़ा हुआ है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मनु की निंदा करने वाले इन लोगों ने मनुस्मृति को कभी गंभीरता से पढ़ा भी नहीं है। स्वामी दयानंद द्वारा आज से 140 वर्ष पूर्व यह सिद्ध कर दिया था की मनुस्मृति में मिलावट की गई है। इस कारण से ऐसा प्रतीत होता है कि मनुस्मृति वर्ण व्यवस्था की नहीं अपितु जातिवाद का समर्थन करती है। महर्षि मनु ने सृष्टि का प्रथम संविधान मनु स्मृति के रूप में बनाया था। कालांतर में इसमें जो मिलावट हुई उसी के कारण इसका मूल सन्देश जो वर्णव्यवस्था का समर्थन करना था के स्थान पर जातिवाद प्रचारित हो गया।
Jignesh Mewani’s name Manusmriti and Vivek Arya’s open letter on casteism
मनुस्मृति पर दलित समाज यह आक्षेप लगाता है कि मनु ने जन्म के आधार पर जातिप्रथा का निर्माण किया और शूद्रों के लिए कठोर दंड का विधान किया और ऊँची जाति विशेषरूप से ब्राह्मणों के लिए विशेष प्रावधान का विधान किया।
मनुस्मृति उस काल की है जब जन्मना जाति व्यवस्था के विचार का भी कोई अस्तित्व नहीं था | अत: मनुस्मृति जन्मना समाज व्यवस्था का कही पर  भी समर्थन नहीं करती | महर्षि मनु ने मनुष्य के गुण- कर्म – स्वभाव पर आधारित समाज व्यवस्था की रचना कर के वेदों में परमात्मा द्वारा दिए गए आदेश का ही पालन किया है (देखें – ऋग्वेद-१०.१०.११-१२, यजुर्वेद-३१.१०-११, अथर्ववेद-१९.६.५-६) |
यह वर्ण व्यवस्था है।  वर्ण शब्द “वृञ” धातु से बनता है जिसका मतलब है चयन या चुनना और सामान्यत: प्रयुक्त शब्द वरण भी यही अर्थ रखता है।
मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था को ही बताया गया है और जाति व्यवस्था को नहीं इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में कहीं भी जाति शब्द ही नहीं है बल्कि वहां चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है।  यदि जाति का इतना ही महत्त्व होता तो मनु इसका उल्लेख अवश्य करते कि कौनसी जाति ब्राह्मणों से संबंधित है, कौनसी क्षत्रियों से, कौनसी वैश्यों और शूद्रों से सम्बंधित हैं।
इस का मतलब हुआ कि स्वयं को जन्म से ब्राह्मण या उच्च जाति का मानने वालों के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है | ज्यादा से ज्यादा वे इतना बता सकते हैं कि कुछ पीढ़ियों पहले से उनके पूर्वज स्वयं को ऊँची जाति का कहलाते आए हैं | ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि सभ्यता के आरंभ से ही यह लोग ऊँची जाति के थे | जब वह यह साबित नहीं कर सकते तो उनको यह कहने का क्या अधिकार है कि आज जिन्हें जन्मना शूद्र माना जाता है, वह कुछ पीढ़ियों पहले ब्राह्मण नहीं थे ? और स्वयं जो अपने को ऊँची जाति का कहते हैं वे कुछ पीढ़ियों पहले शूद्र नहीं थे ?
मनुस्मृति ३.१०९ में साफ़ कहा है कि अपने गोत्र या कुल की दुहाई देकर भोजन करने वाले को स्वयं का उगलकर खाने वाला माना जाए | अतः मनुस्मृति के अनुसार जो जन्मना ब्राह्मण या ऊँची जाति वाले अपने गोत्र या वंश का हवाला देकर स्वयं को बड़ा कहते हैं और मान-सम्मान की अपेक्षा रखते हैं उन्हें तिरस्कृत किया जाना चाहिए |
मनुस्मृति २. १३६: धनी होना, बांधव होना, आयु में बड़े होना, श्रेष्ठ कर्म का होना और विद्वत्ता यह पाँच सम्मान के उत्तरोत्तर मानदंड हैं | इन में कहीं भी कुल, जाति, गोत्र या वंश को सम्मान का मानदंड नहीं माना गया है |
वर्णों में परिवर्तन :
मनुस्मृति १०.६५: ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है | इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं |
मनुस्मृति ९.३३५: शरीर और मन से शुद्ध- पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्रह्म जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है |
मनुस्मृति के अनेक श्लोक कहते हैं कि उच्च वर्ण का व्यक्ति भी यदि श्रेष्ट कर्म नहीं करता, तो शूद्र (अशिक्षित) बन जाता है |
उदाहरण-
२.१०३: जो मनुष्य नित्य प्रात: और सांय ईश्वर आराधना नहीं करता उसको शूद्र समझना चाहिए |
२.१७२: जब तक व्यक्ति वेदों की शिक्षाओं में दीक्षित नहीं होता वह शूद्र के ही समान है
४.२४५ : ब्राह्मण- वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ट – अति श्रेष्ट व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच- नीचतर  व्यक्तिओं का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ट बनता जाता है | इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है | अतः स्पष्ट है कि ब्राह्मण उत्तम कर्म करने वाले विद्वान व्यक्ति को कहते हैं और शूद्र का अर्थ अशिक्षित व्यक्ति है | इसका, किसी भी तरह जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है |
२.१६८: जो ब्राह्मण,क्षत्रिय या वैश्य वेदों का अध्ययन और पालन छोड़कर अन्य विषयों में ही परिश्रम करता है, वह शूद्र बन जाता है | और उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी वेदों के ज्ञान से वंचित होना पड़ता है | अतः मनुस्मृति के अनुसार तो आज भारत में कुछ अपवादों को छोड़कर बाकी सारे लोग जो भ्रष्टाचार, जातिवाद, स्वार्थ साधना, अन्धविश्वास, विवेकहीनता, लिंग-भेद, चापलूसी, अनैतिकता इत्यादि में लिप्त हैं – वे सभी शूद्र हैं |
२ .१२६: भले ही कोई ब्राह्मण हो, लेकिन अगर वह अभिवादन का शिष्टता से उत्तर देना नहीं जानता तो वह शूद्र (अशिक्षित व्यक्ति) ही है |
शूद्र भी पढ़ा सकते हैं :
शूद्र भले ही अशिक्षित हों तब भी उनसे कौशल और उनका विशेष ज्ञान प्राप्त किया जाना चाहिए |
२.२३८: अपने से न्यून व्यक्ति से भी विद्या को ग्रहण करना चाहिए और नीच कुल में जन्मी उत्तम स्त्री को भी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए|
२.२४१ : आवश्यकता पड़ने पर अ-ब्राह्मण से भी विद्या प्राप्त की जा सकती है और शिष्यों को पढ़ाने के दायित्व का पालन वह गुरु जब तक निर्देश दिया गया हो तब तक करे |
ब्राह्मणत्व का आधार कर्म :
मनु की वर्ण व्यवस्था जन्म से ही कोई वर्ण नहीं मानती | मनुस्मृति के अनुसार माता- पिता को बच्चों के बाल्यकाल में ही उनकी रूचि और प्रवृत्ति को पहचान कर ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण का ज्ञान और प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए भेज देना चाहिए |
कई ब्राह्मण माता – पिता अपने बच्चों को ब्राह्मण ही बनाना चाहते हैं परंतु इस के लिए व्यक्ति में ब्रह्मणोचित गुण, कर्म,स्वभाव का होना अति आवश्यक है| ब्राह्मण वर्ण में जन्म लेने मात्र से या ब्राह्मणत्व का प्रशिक्षण किसी गुरुकुल में प्राप्त कर लेने से ही कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता, जब तक कि उसकी योग्यता, ज्ञान और कर्म ब्रह्मणोचित न हों
२.१५७ : जैसे लकड़ी से बना हाथी और चमड़े का बनाया हुआ हरिण सिर्फ़ नाम के लिए ही हाथी और हरिण कहे जाते हैं वैसे ही बिना पढ़ा ब्राह्मण मात्र नाम का ही ब्राह्मण होता है |
२.२८: पढने-पढ़ाने से, चिंतन-मनन करने से, ब्रह्मचर्य, अनुशासन, सत्यभाषण आदि व्रतों का पालन करने से, परोपकार आदि सत्कर्म करने से, वेद, विज्ञान आदि पढने से, कर्तव्य का पालन करने से, दान करने से और आदर्शों के प्रति समर्पित रहने से मनुष्य का यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है |
शिक्षा ही वास्तविक जन्म  :
मनु के अनुसार मनुष्य का वास्तविक जन्म विद्या प्राप्ति के उपरांत ही होता है | जन्मतः प्रत्येक मनुष्य शूद्र या अशिक्षित है | ज्ञान और संस्कारों से स्वयं को परिष्कृत कर योग्यता हासिल कर लेने पर ही उसका दूसरा जन्म होता है और वह द्विज कहलाता है | शिक्षा प्राप्ति में असमर्थ रहने वाले शूद्र ही रह जाते हैं |
यह पूर्णत: गुणवत्ता पर आधारित व्यवस्था है, इसका शारीरिक जन्म या अनुवांशिकता से कोई लेना-देना नहीं है|
२.१४८ : वेदों में पारंगत आचार्य द्वारा शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने के उपरांत ही उसका वास्तविक मनुष्य जन्म होता है | यह जन्म मृत्यु और विनाश से रहित होता है |ज्ञानरुपी जन्म में दीक्षित होकर मनुष्य मुक्ति को प्राप्त कर लेता है| यही मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य है| सुशिक्षा के बिना मनुष्य ‘ मनुष्य’ नहीं बनता|
इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होने की बात तो छोडो जब तक मनुष्य अच्छी तरह शिक्षित नहीं होगा तब तक उसे मनुष्य भी नहीं माना जाएगा |
२.१४६ : जन्म देने वाले पिता से ज्ञान देने वाला आचार्य रूप पिता ही अधिक बड़ा और माननीय है, आचार्य द्वारा प्रदान किया गया ज्ञान मुक्ति तक साथ देता हैं | पिताद्वारा प्राप्त शरीर तो इस जन्म के साथ ही नष्ट हो जाता है|
२.१४७ :  माता- पिता से उत्पन्न संतति का माता के गर्भ से प्राप्त जन्म साधारण जन्म है| वास्तविक जन्म तो शिक्षा पूर्ण कर लेने के उपरांत ही होता है|
अत: अपनी श्रेष्टता साबित करने के लिए कुल का नाम आगे धरना मनु के अनुसार अत्यंत मूर्खतापूर्ण कृत्य है | अपने कुल का नाम आगे रखने की बजाए व्यक्ति यह दिखा दे कि वह कितना शिक्षित है तो बेहतर होगा |
१०.४: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन वर्ण विद्याध्ययन से दूसरा जन्म प्राप्त करते हैं | विद्याध्ययन न कर पाने वाला शूद्र, चौथा वर्ण है | इन चार वर्णों के अतिरिक्त आर्यों में या श्रेष्ट मनुष्यों में पांचवा कोई वर्ण नहीं है |
इस का मतलब है कि अगर कोई अपनी शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाया तो वह दुष्ट नहीं हो जाता | उस के कृत्य यदि भले हैं तो वह अच्छा इन्सान कहा जाएगा | और अगर वह शिक्षा भी पूरी कर ले तो वह भी द्विज गिना जाएगा | अत: शूद्र मात्र एक विशेषण है, किसी जाति विशेष का नाम नहीं |
‘नीच’ कुल में जन्में व्यक्ति का तिरस्कार नहीं :
किसी व्यक्ति का जन्म यदि ऐसे कुल में हुआ हो, जो समाज में आर्थिक या अन्य दृष्टी से पनप न पाया हो तो उस व्यक्ति को केवल कुल के कारण पिछड़ना न पड़े और वह अपनी प्रगति से वंचित न रह जाए, इसके लिए भी महर्षि मनु ने नियम निर्धारित किए हैं |
४.१४१: अपंग, अशिक्षित, बड़ी आयु वाले, रूप और धन से रहित या निचले कुल वाले, इन को आदर और / या अधिकार से वंचित न करें | क्योंकि यह किसी व्यक्ति की परख के मापदण्ड नहीं हैं|
प्राचीन इतिहास में वर्ण परिवर्तन के उदाहरण :
ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र वर्ण की सैद्धांतिक अवधारणा गुणों के आधार पर है, जन्म के आधार पर नहीं | यह बात सिर्फ़ कहने के लिए ही नहीं है, प्राचीन समय में इस का व्यवहार में चलन था | जब से इस गुणों पर आधारित वैज्ञानिक व्यवस्था को हमारे दिग्भ्रमित पुरखों ने मूर्खतापूर्ण जन्मना व्यवस्था में बदला है, तब से ही हम पर आफत आ पड़ी है जिस का सामना आज भी कर रहें हैं|
वर्ण परिवर्तन के कुछ उदाहरण –
(a) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है |
(b) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन  किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)
(c) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए  |
(d) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४)
अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?
(e) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)
(f) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(g) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(h) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |
(i) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |
(j) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)
(k) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं |
(l) मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |
(m) ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना |
(n) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |
(o) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |
(p) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |
(q) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया |
(r) वत्स शूद्र कुल में उत्पन्न होकर भी ऋषि बने (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९) |
(s) मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोकों से भी पता चलता है कि कुछ क्षत्रिय जातियां, शूद्र बन गईं | वर्ण परिवर्तन की साक्षी देने वाले यह श्लोक मनुस्मृति में बहुत बाद के काल में मिलाए गए हैं | इन परिवर्तित जातियों के नाम हैं – पौण्ड्रक, औड्र, द्रविड, कम्बोज, यवन, शक, पारद, पल्हव, चीन, किरात, दरद, खश |
(t) महाभारत अनुसन्धान पर्व (३५.१७-१८) इसी सूची में कई अन्य नामों को भी शामिल करता है – मेकल, लाट, कान्वशिरा, शौण्डिक, दार्व, चौर, शबर, बर्बर|
(u) आज भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दलितों में समान गोत्र मिलते हैं | इस से पता चलता है कि यह सब एक ही पूर्वज, एक ही कुल की संतान हैं | लेकिन कालांतर में वर्ण व्यवस्था गड़बड़ा गई और यह लोग अनेक जातियों में बंट गए |
शूद्रों  के प्रति आदर :
मनु परम मानवीय थे| वे जानते थे कि सभी शूद्र जानबूझ कर शिक्षा की उपेक्षा नहीं कर सकते | जो किसी भी कारण से जीवन के प्रथम पर्व में ज्ञान और शिक्षा से वंचित रह गया हो, उसे जीवन भर इसकी सज़ा न भुगतनी पड़े इसलिए वे समाज में शूद्रों के लिए उचित सम्मान का विधान करते हैं | उन्होंने शूद्रों के प्रति कभी अपमान सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं किया, बल्कि मनुस्मृति में कई स्थानों पर शूद्रों के लिए अत्यंत सम्मानजनक शब्द आए हैं |
मनु की दृष्टी में ज्ञान और शिक्षा के अभाव में शूद्र समाज का सबसे अबोध घटक है, जो परिस्थितिवश भटक सकता है | अत: वे समाज को उसके प्रति अधिक सहृदयता और सहानुभूति रखने को कहते हैं |
कुछ और उदात्त उदाहरण देखें –
३.११२: शूद्र या वैश्य के अतिथि रूप में आ जाने पर, परिवार उन्हें सम्मान सहित भोजन कराए |
३.११६: अपने सेवकों (शूद्रों) को पहले भोजन कराने के बाद ही दंपत्ति भोजन करें |
२.१३७: धन, बंधू, कुल, आयु, कर्म, श्रेष्ट विद्या से संपन्न व्यक्तियों के होते हुए भी वृद्ध शूद्र को पहले सम्मान दिया जाना चाहिए |
मनुस्मृति वेदों पर आधारित :
वेदों को छोड़कर अन्य कोई ग्रंथ मिलावटों से बचा नहीं है | वेद प्रक्षेपों से कैसे अछूते रहे, जानने के लिए ‘ वेदों में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता ? ‘ पढ़ें | वेद ईश्वरीय ज्ञान है और सभी विद्याएँ उसी से निकली हैं | उन्हीं को आधार मानकर ऋषियों ने अन्य ग्रंथ बनाए|  वेदों का स्थान और प्रमाणिकता सबसे ऊपर है और उनके रक्षण से ही आगे भी जगत में नए सृजन संभव हैं | अत: अन्य सभी ग्रंथ स्मृति, ब्राह्मण, महाभारत, रामायण, गीता, उपनिषद, आयुर्वेद, नीतिशास्त्र, दर्शन इत्यादि को परखने की कसौटी वेद ही हैं | और जहां तक वे  वेदानुकूल हैं वहीं तक मान्य हैं |
मनु भी वेदों को ही धर्म का मूल मानते हैं (२.८-२.११)
२.८: विद्वान मनुष्य को अपने ज्ञान चक्षुओं से सब कुछ वेदों के अनुसार परखते हुए, कर्तव्य का पालन करना चाहिए |
इस से साफ़ है कि मनु के विचार, उनकी मूल रचना वेदानुकूल ही है और मनुस्मृति में वेद विरुद्ध मिलने वाली मान्यताएं प्रक्षिप्त मानी जानी चाहियें |
शूद्रों को भी वेद पढने और वैदिक संस्कार करने का अधिकार :
वेद में ईश्वर कहता है कि मेरा ज्ञान सबके लिए समान है चाहे पुरुष हो या नारी, ब्राह्मण हो या शूद्र सबको वेद पढने और यज्ञ करने का अधिकार है |
देखें – यजुर्वेद २६.१, ऋग्वेद १०.५३.४, निरुक्त ३.८  इत्यादि और
और मनुस्मृति भी यही कहती है | मनु ने शूद्रों को उपनयन ( विद्या आरंभ ) से वंचित नहीं रखा है | इसके विपरीत उपनयन से इंकार करने वाला ही शूद्र कहलाता है |
वेदों के ही अनुसार मनु शासकों के लिए विधान करते हैं कि वे शूद्रों का वेतन और भत्ता किसी भी परिस्थिति में न काटें ( ७.१२-१२६, ८.२१६) |
संक्षेप में –
मनु को जन्मना जाति – व्यवस्था का जनक मानना निराधार है | इसके विपरीत मनु मनुष्य की पहचान में जन्म या कुल की सख्त उपेक्षा करते हैं | मनु की वर्ण व्यवस्था पूरी तरह गुणवत्ता पर टिकी हुई है |
प्रत्येक मनुष्य में चारों वर्ण हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र | मनु ने ऐसा प्रयत्न किया है कि प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान जो सबसे सशक्त वर्ण है – जैसे किसी में ब्राह्मणत्व ज्यादा है, किसी में क्षत्रियत्व, इत्यादि का विकास हो और यह विकास पूरे समाज के विकास में सहायक हो |
महर्षि मनु पर जातिवाद का समर्थक होने का आक्षेप लगाना मूर्खता हैं क्यूंकि दोष मिलावट करने वालो का हैं न की मनु महर्षि का।
Voiced again on twitter Justice for Bapu

ट्वीटर पर फिर से उठी आवाज हिन्दू संत आसाराम बापू को मिले न्याय

 January 14, 2018
🚩जोधपुर जेल में हिन्दू संत आसाराम बापू 4 साल 5 महीने से न्यायिक हिरासत में हैं, अभीतक उनके खिलाफ #एक भी #सबूत #मिला #नही है, उनके ऊपर गुजरात सूरत की एक लड़की ने भी आरोप लगाया है, लेकिन बाद में आरोप लगानेवाली सूरत की #लड़की ने #कहा : ‘‘#धमकाकर मुझसे #दुष्कर्म का #आरोप #लगवाया #गया था । चूँकि उस वक्त मैं डरी-सहमी थी, इसलिए सच सामने नहीं ला पायी। अब चूँकि मैं आत्मग्लानि के बोध से ग्रसित हूँ, धारा 164 के तहत दिये बयान को बदलना चाहती हूँ ।’’
🚩लेकिन सूरत लड़की के बयान लेने के लिए सरकार द्वारा विरोध किया गया । न्यायालय ने भी बयान बदलने से मना कर दिया ।
🚩#लड़की द्वारा #बयान #वापिस लेने के लिए #तैयार #होते #हुये भी उसके बयान नही लिये गए और 11 साल पुराना केस चलाया जा रहा है और #जमानत तक भी #नही #दी #जा #रही है जिससे जनता में भारी रोष व्याप्त है ।
🚩आज ट्वीटर पर #बापूजी_को_न्याय_मिले हैशटैग को लेकर अनेकों ट्वीटस की जा रही हैं ।
🚩आइये जाने कुछ ट्वीट्स द्वारा, क्या कह रहे हैं यूजर
🚩वैशाली कहती हैं कि जनता स्वयं सोचे, ये कहाँ का न्याय है कि एक बेकसूर सन्त को बेवजह कारावास की पीड़ा मिल रही है, जबकि केस की मुख्य पात्र वो झूठी लड़की आने सभी दस्तावेजों में बालिग है।
 #बापूजी_को_न्याय_मिले
🚩सतीश जी का कहना है कि #बापूजी_को_न्याय_मिले !! क्योंकि एक बोगस केस में उन पर इतना बड़ा अत्याचार केवल उन पर ही नहीं अपितु समस्त हिन्दू धर्म हिन्दू सन्तों की अस्मिता पर है।
🚩सोनिया कहती है कि साध्वी प्रज्ञा को बिना किसी सबूत के 9 सालों तक जेल में भयंकर प्रताड़नाएं दी गयी और Sant Asaram Bapu Ji को बिना किसी सबूत के 4+साल से न्याय न मिलना, न्यायव्यवस्था पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है।
 #बापूजी_को_न्याय_मिले
🚩स्वीटी का कहना है कि Mam, आज सारा देश जान चुका है कि लड़की, अदालत व बोगस रेप केस का फंदा बना कर ही निर्दोष Asaram Bapu Ji को कारावास भेज दिया गया। इसलिये अब ये अन्याय खत्म किया जाए ताकी
 #बापूजी_को_न्याय_मिले !
🚩दिनेश कहता हैं कि वाह रे कानून ,
 ये संविधान कौन सी धारा में लिखा है कि संत यदि निर्दोष है तो भी उन्हें न्याय नहीं मिलेगा और जो अभिनेता दोषी है उनको तुरंत बेल ??
 #बापूजी_को_न्याय_मिले
🚩सुदेश का कहना है कि जब लड़की की मेडिकल जांच हुई तो उसके sign नहीं लिए गए, जबकि क़ानूनी प्रक्रिया का ये एक अहम हिस्सा था। वो इसलिये क्योंकि निर्दोष Asaram Bapu Ji को फंसाने के मकसद था, लेकिन अब तो
 #बापूजी_को_न्याय_मिले ही और खत्म हो ये झूठ का व्यापार!
🚩रक्षिता कहती है कि #बापूजी_को_न्याय_मिले कयोंकि सब सामने आ चुका है कि कितने बडे साज़िशें चल रही है बापूजी को बदनाम करने की अब किसलीये न्याय मे देरी??
🚩तेज जी का कहना है कि आज समय है निर्दोष सन्तों पर लग रहे झूठे लांछन को खत्म करने का, इसलिये भ्रष्ट न्यायतंत्र को देना होगा जवाब क्यों उंसने निर्दोष Aasaram Bapu Ji पर कानूनी अधर्म किया ??
 #बापूजी_को_न्याय_मिले
🚩मोनू लिखते हैं कि संत Asaram BapuJi को बिना सबूत जेल मे रखना हिंदूओं के लिए इससे बडा अन्याय ओर क्या? #बापूजी_को_न्याय_मिले
🚩YssHeadOffice से भी ट्वीट हुई जिसमें कहा गया कि मेडिकल रिपोर्ट लगाए गए आरोप पुष्ट नही करता।
LIC दस्तावेज व लड़की द्वारा बताये जन्मतिथि मे विरोधाभास।
सरकारी गवाह सुधा पटेल द्वारा पुलिस पर  झूठा बयान दर्ज करने के आरोप।
ये तथ्य सिद्ध करते है कि बापूजी को षड्यंत्र कर फंसाया है।
🚩इसलिए हम मांग करते हैं कि
#बापूजी_को_न्याय_मिले
🚩इस तरह से हजारों ट्वीट्स द्वारा जनता न्यायप्रणाली से तरह-तरह के सवाल कर रही है।
🚩क्या इसका कोई जवाब है न्यायतंत्र के पास ???
🚩गौरतलब है कि रेप आरोपी पत्रकार तरुण तेजपाल, 9000 करोड़ लेकर भाग जाने वाला विजय माल्या, #बोफोर्स_घोटाला, कॉमनवेल्थ_गेम्स_घोटाला,  2जी_स्पेक्ट्रम_घोटाला, अनाज घोटला, #कोयला घोटाला आदि आदि अरबो-खरबों के बड़े बड़े #घोटालेबाज तो आराम से बाहर घूम रहे हैं लेकिन वहीं दूसरी ओर अभीतक एक भी आरोप सिद्ध नही हुआ ऐसे हिन्दू संत आसारामजी बापू, धनंजय देसाई आदि हिंदुत्वनिष्ठ बिना सबूत सालों से जेल में हैं जबकि इन सभी हिन्दुत्वनिष्ठों को फंसाने के सैकड़ों सबूत भी मिल चुके हैं । उसके बावजूद भी कोर्ट इन्हें जमानत तक नहीं दे रही है ।
🚩अब देखना ये है इन #हजारों-लाखों #लोगों की #आवाज #सरकार और #न्यायालय #कब #सुनती है ???
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Know why the country is celebrated Makar Sankranti? What should i do

जानिए देशभर में क्यों मनाई जाती है मकर संक्रांति? क्या करना चाहिए उसदिन

January 13, 2018

🚩हिन्दू संस्कृति अति प्राचीन #संस्कृति है, उसमें अपने जीवन पर प्रभाव पड़ने वाले ग्रह, नक्षत्र के अनुसार ही वार, तिथि त्यौहार बनाये गये हैं ।
इसमें से एक है  मकर संक्रांति..!!

Know why the country is celebrated Makar Sankranti? What should i do

🚩हिंदू धर्म ने माह को दो भागों में बाँटा है- कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। इसी तरह वर्ष को भी दो भागों में बाँट रखा है। #पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। उक्त दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है।

🚩मकर संक्रांति के दिन #सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर ढलता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं।

🚩 इसी दिन से अलग-अलग राज्यों में गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है। कुंभ के पहले स्नान की शुरुआत भी इसी दिन से होती है।

🚩सूर्य पर आधारित #हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का बहुत महत्व माना गया है। वेद और पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है। होली, दीपावली, दुर्गोत्सव, शिवरात्रि और अन्य कई त्यौहार जहाँ विशेष कथा पर आधारित हैं, वहीं #मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है। मकर संक्रांति का महत्व #हिंदू धर्मावलंबियों के लिए वैसा ही है जैसे वृक्षों में पीपल, हाथियों में ऐरावत और पहाड़ों में हिमालय।

🚩सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। इस राशि परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं। यही एकमात्र पर्व है जिसे समूचे #भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हो, किंतु यह बहुत ही महत्व का पर्व है।

🚩विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है।

🚩उत्तर प्रदेश : मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है। सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है।

🚩गुजरात और राजस्थान : उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है। पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है।

🚩आंध्रप्रदेश : संक्रांति के नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है।

🚩तमिलनाडु : किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। घी में दाल-चावल की खिचड़ी पकाई और खिलाई जाती है।

🚩महाराष्ट्र : लोग गजक और तिल के लड्डू खाते हैं और एक दूसरे को भेंट देकर शुभकामनाएं देते हैं।

🚩पश्चिम बंगाल : हुगली नदी पर गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है।

🚩असम : भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है

🚩पंजाब : एक दिन पूर्व लोहड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। धूमधाम के साथ समारोहों का आयोजन किया जाता है।

🚩इसी दिन से हमारी धरती एक नए वर्ष में और सूर्य एक नई गति में प्रवेश करता है। वैसे वैज्ञानिक कहते हैं कि 21 मार्च को धरती सूर्य का एक चक्कर पूर्ण कर लेती है तो इसे माने तो #नववर्ष तभी मनाया जाना चाहिए। #इसी 21 मार्च के आसपास ही विक्रम संवत का नववर्ष शुरू होता है और #गुड़ी पड़वा मनाया जाता है, किंतु 14 जनवरी ऐसा दिन है, जबकि धरती पर अच्छे दिन की शुरुआत होती है। ऐसा इसलिए कि सूर्य दक्षिण के बजाय अब उत्तर को गमन करने लग जाता है। जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर गमन करता है तब तक उसकी किरणों को ठीक नही माना गया है, लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर गमन करने लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं।

🚩मकर संक्रांति के दिन ही पवित्र #गंगा नदी का धरती पर अवतरण हुआ था। महाभारत में #पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था, कारण कि #उत्तरायण में देह छोड़ने वाली आत्माएँ या तो कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती हैं या पुनर्जन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है।

🚩दक्षिणायन में देह छोड़ने पर बहुत काल तक आत्मा को अंधकार का सामना करना पड़ सकता है। सब कुछ प्रकृति के नियम के तहत है, इसलिए सभी कुछ प्रकृति से बद्ध है। #पौधा प्रकाश में अच्छे से खिलता है, अंधकार में सिकुड़ भी सकता है। इसीलिए मृत्यु हो तो प्रकाश में हो ताकि साफ-साफ दिखाई दे कि हमारी गति और स्थिति क्या है। क्या हम इसमें सुधार कर सकते हैं?
क्या ये हमारे लिए उपयुक्त चयन का मौका है?

🚩स्वयं भगवान #श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए #गीता में कहा है कि उत्तरायण के छह मास के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग #ब्रह्म को प्राप्त हैं। इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है। (श्लोक-24-25)

🚩क्या करे मकर संक्रांति को..???

🚩14 जनवरी – मकर संक्रांति ( पुण्यकालः दोपहर 1:27 से सूर्यास्त तक)

🚩मकर संक्रांति या #उत्तरायण दान-पुण्य का पर्व है । इस दिन किया गया #दान-पुण्य, जप-तप अनंतगुना फल देता है । इस दिन गरीब को अन्नदान, जैसे तिल व गुड़ का दान देना चाहिए। इसमें तिल या तिल के लड्डू या तिल से बने खाद्य पदार्थों को दान देना चाहिए । कई लोग रुपया-पैसा भी दान करते हैं।

🚩मकर संक्रांति के दिन साल का पहला #पुष्य नक्षत्र है मतलब खरीदारी के लिए बेहद शुभ दिन।

🚩उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण के
इन नामों का जप विशेष हितकारी है ।

ॐ मित्राय नमः । ॐ रवये नमः ।
ॐ सूर्याय नमः । ॐ भानवे नमः ।
ॐ खगाय नमः । ॐ पूष्णे नमः ।
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः । ॐ मरीचये नमः ।
ॐ आदित्याय नमः । ॐ सवित्रे नमः ।
ॐ अर्काय नमः ।  ॐ भास्कराय  नमः ।
ॐ सवितृ सूर्यनारायणाय नमः ।

🚩ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नम:।  इस मंत्र से सूर्यनारायण की वंदना कर लेना, उनका चिंतन करके प्रणाम कर लेना। इससे सूर्यनारायण प्रसन्न होंगे, निरोगता देंगे और अनिष्ट से भी रक्षा करेंगे।

🚩यदि नदी तट पर जाना संभव नही है, तो अपने घर के स्नान घर में #पूर्वाभिमुख होकर जल पात्र में तिल मिश्रित जल से स्नान करें। साथ ही समस्त पवित्र नदियों व तीर्थ का स्मरण करते हुए ब्रम्हा, विष्णु, रूद्र और भगवान भास्कर का ध्यान करें। साथ ही इस जन्म के पूर्व जन्म के ज्ञात अज्ञात मन, वचन, शब्द, काया आदि से उत्पन्न दोषों की निवृत्ति हेतु #क्षमा याचना करते हुए सत्य धर्म के लिए निष्ठावान होकर सकारात्मक कर्म करने का संकल्प लें। जो संक्रांति के दिन स्नान नही करता वह 7 जन्मों तक निर्धन और रोगी रहता है ।

🚩तिल का महत्व..!!

🚩विष्णु धर्मसूत्र में उल्लेख है कि मकर संक्रांति के दिन #तिल का 6 प्रकार से उपयोग करने पर जातक के जीवन में सुख व समृद्धि आती है।

🚩तिल के तेल से स्नान करना। #तिल का उबटन लगाना। पितरों को तिलयुक्त तेल अर्पण करना। तिल की आहूति देना। तिल का दान करना। तिल का सेंवन करना।

🚩ब्रह्मचर्य बढ़ाने के लिए

🚩ब्रह्मचर्य रखना हो, संयमी जीवन जीना हो, वे
उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण का
सुमिरन करें, जिससे बुद्धि में बल बढे ।
ॐ सूर्याय नमः… ॐ शंकराय नमः…
ॐ गं गणपतये नमः… ॐ हनुमते नमः…
ॐ भीष्माय नमः… ॐ अर्यमायै नमः…
ॐ… ॐ…

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Know crysto Christian, racism, isolation, treason and treason in India

जानिए क्रिप्टो क्रिस्चियन को, हिन्दुस्तान में जातिवाद, अलगाव, देशद्रोह सबके पीछे है  

January 12, 2018
भगवान बुध्द के जैसी दिखने वाली एक मूर्ति बनाई गई है जो बच्चा को गोद में लेकर बैठे है, वे वास्तव में मैरी की है जिसे जापान के क्रिप्टो-क्रिस्चियन पूजते थे। ये क्रिप्टो-क्रिस्चियन क्या है? ग्रीक भाषा मे क्रिप्टो शब्द का अर्थ हुआ छुपा हुआ या गुप्त; क्रिप्टो-क्रिस्चियन (crypto-christian) का अर्थ हुआ गुप्त-ईसाई। इसमें महत्वपूर्ण बात ये है कि क्रिप्टो-क्रिस्चियन कोई गाली या नकारात्मक शब्द नहीं हैं।
क्रिप्टो-क्रिस्चियानिटी ईसाई धर्म की एक संस्थागत प्रैक्टिस है। क्रिप्टो-क्रिस्चियनिटी के मूल सिद्धांत के अंर्तगत क्रिस्चियन जिस देश में अल्पसंख्यक होते है वहाँ वे दिखावे के तौर पर तो उस देश के ईश्वर की पूजा करते है, वहाँ का धर्म, रिवाज मानते हैं जो कि उनका छद्मावरण होता है, पर वास्तव में अंदर से वे ईसाई होते हैं और निरंतर ईसाई धर्म का प्रसार करते रहते है।
Know crysto Christian, racism, isolation, treason and treason in India
जिस तरह इस्लाम का प्रचार तलवार के बल पर हुआ है वैसे ही ईसाईयत का प्रचार 2 निम्नलिखित बुनियादी सिद्धांतों पर हुआ है. 1) Defiling other Gods यानि दूसरे धर्म के ईश्वर, प्रतीकों की गरिमा भंग करो। 2) Soul Harvesting यानि दूसरे की कमजोरियों, दुखों, मजबूरियों का फायदा उठाओ। क्रिप्टो-क्रिश्चियन्स स्थानीय छद्मावरण में रहते हुए इन दोनों सिद्धांतों के आधार ईसाईयत का प्रचार करो।
क्रिप्टो-क्रिस्चियन का सबसे पहला उदाहरण रोमन सामाज्य में मिलता है जब ईसाईयत ने शुरुवाती दौर में रोम में अपने पैर रखे थे। तत्कालीन महान रोमन सम्राट ट्रॉजन ने ईसाईयत को रोमन संस्कृति के लिए खतरा समझा और जितने रोमन ईसाई बने थे उनके सामने प्रस्ताव रखा कि या तो वे ईसाईयत छोड़ें या मृत्यु-दंड भुगतें। रोमन ईसाईयों ने मृत्यु-दंड से बचने के लिए ईसाई धर्म छोड़ने का नाटक किया और उसके बाद ऊपर से वे रोमन देवी देवताओं की पूजा करते रहे, पर अंदर से ईसाईयत को मानते थे।
देखा गया है, मुसलमान जब 2-4 प्रतिशत होते हैं तब उस देश के कानून को मनाते है पर जब 20-30 प्रतिशत होते हैं तब शरीअत की मांग शुरू होती है, दंगे होते है। आबादी और अधिक बढ़ने पर गैर-मुसलमानों की ethnic cleansing शुरू हो जाती है। क्रिप्टो-क्रिश्चियन्स की कार्य शैली अलग है पर इरादे वही मुसलमानों वाले की स्थानीय धर्म खत्म करके अपने धर्म का प्रसार करना।
क्रिप्टो-क्रिस्चियन जब 1 प्रतिशत से कम होते है तब वह उस देश के ईश्वर को अपनाकर अपना काम करते रहते हैं और जब अधिक संख्या में हो जाते तो उन्ही देवी-देवताओं का अपमान करने लगते हैं। Hollywood की मशहूर फिल्म Agora(2009) हर हिन्दू को देखनी चाहिए। इसमें दिखाया है कि जब क्रिप्टो-क्रिस्चियन रोम में संख्या में अधिक हुए तब उन्होंने रोमन देवी-देवताओं का अपमान (Defiling) करना शुरू कर दिया। जिससे रोमन समाज में तनाव और गृह युुुद्ध की स्थिति बन गयी।
भारत में भी क्रिप्टो-क्रिस्चियन ने पकड़ बनानी शुरू की तो यहाँ भी हिन्दू देवी-देवताओं, ब्राह्मणों को गाली देने का काम शुरू कर दिया। हिन्दू नामों में छुपे क्रिप्टो-क्रिश्चियन्स पिछले कई दशकों से देवी दुर्गा को वेश्या प्रचारित कर रहे हैं। राम को शंभूक (बलि देने वाला दुष्ट तांत्रिक) का हत्यारा प्रचारित कर रहे हैं। ब्राह्मणों के खिलाफ anti-Brahminism की विचारधारा के अंतर्गत ब्राह्मणों के खिलाफ मनगढंत कहानियां बनाई जा रही हैं जैसे कि ब्राह्मण दलितों के कान में पिघला शीशा डालता है, महिलाओं को घर से उठा के देवदासी बना देता है फिर उनका शोषण करता है। ये सब ईसाई प्रचार के पहले सिद्धांत, Defiling other Gods के अंतर्गत हो रहा है, मतलब, जो काम यूरोप में 2000 साल पहले हुआ वह भारत में आज हो रहा है।
दूसरा सिद्धांत है soul harvesting जब इंसान दुखी होता है या किसी मुश्किल में होता है तब वह receptive हो जाता है यानि दूसरे के विचार आसानी से ग्रहण कर सकता है जो ईसाई धर्मान्तरण का रास्ता है। इसी कारण ये अस्पताल खोलते है कि दुःखी मरीजों का धर्मान्तरण करवाएं, प्राकृतिक आपदाओं में सेवा के लिए नहीं धर्मान्तरण के लिए जाते है जैसे कि नेपाल का भूकंप, भोपाल गैस कांड में टेरेसा का कलकत्ते से भोपाल जाना।
जब तक हिन्दू समाज खुशहाल है और सभी आपस मे मिलकर रह रहे हैं, हिंदुओं का धर्मान्तरण मुश्किल है। हिंदुओं में वर्गीकरण हो, आपस मे लड़े, और कलह के बाद हमारा संदेश सुना जाये इसी soul harvesting के चलते हिंदुओं में sc, st, obc की सरकारी पहचान बनाई गई। जितनी बार मंडल कमीशन वाले दंगे होंगे, भुक्तभोगी समाज मिशनिरियों के संदेश के लिए receptive होगा और धर्मान्तरण आसान होगा। दुर्भाग्य से सभी हिन्दू संगठन ईसाईयों की इस दूरगामी चाल को समझने में मंदबुद्धि साबित हुए।
क्रिप्टो-क्रिस्चियन के बहुत से उदाहरण हैं पर सबसे रोचक उदाहरण जापान से है। मिशनरियों का तथाकथित-संत ज़ेवियर जो भारत आया था वह 1550 में धर्मान्तरण के लिए जापान गया और उसने कई बौद्धों को ईसाई बनाया। 1643 में जापान के राष्ट्रवादी राजा शोगुन(Shogun) ने ईसाई धर्म का प्रचार जापान की सामाजिक एकता के लिए खतरा समझा। शोगुन ने बल का प्रयोग किया और कई चर्चो को तोड़ा गया; जीसस-मैरी की मूर्तियां जब्त करके तोड़ दी गईं; बाईबल समेत ईसाई धर्म की कई किताबें खुलेआम जलायी गई। जितने जापानियों ने ईसाई धर्म अपना लिया था उनको प्रताड़ित किया गया, उनकी बलपूर्वक बुद्ध धर्म में घर वापसी कराई गई। जिन्होंने मना किया, उनके सर काट दिए गए। कई ईसाईयों ने बौद्ध धर्म में घर वापसी का नाटक किया और क्रिप्टो-क्रिस्चियन बने रहे। जापान में इन क्रिप्टो-क्रिस्चियन को “काकूरे-क्रिस्चियन” कहा गया।
काकूरे-क्रिस्चियन ने बौद्धों के डर से ईसाई धर्म से संबधित कोई भी किताब रखनी बन्द कर दी। जीसस और मैरी की पूजा करने के लिए इन्होंने प्रार्थना बनायी जो सुनने में बौद्ध मंत्र लगती पर इसमें बाइबल के शब्द होते थे। ये ईसाई प्रार्थनाएँ काकूरे-क्रिस्चियनों ने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित करनी शुरू कर दी। जीसस और मैरी की मूर्तियां बुद्ध जैसी दिखती थी जिसे बौद्ध कभी नहीं समझ पाए कि वह बुद्ध की मूर्तियां नहीं हैं। 1550 से लेकर अगले 400 सालों तक काकूरे-क्रिस्चियन बुद्ध धर्म के छद्मावरण में रहे। 20वी शताब्दी में जब जापान औद्योगिकीकरण की तरफ बढ़ा, जापान की कई कंपनियों टोयोटा, हौंडा, सोनी इत्यादि ने दुनियाँ में अपने झंडे गाड़ने शुरू कर दिए और बौद्धों के धार्मिक कट्टरवाद में कमी आई तो इन काकूरे-क्रिस्चियन बौद्ध धर्म के मुखौटे से बाहर निकल अपनी ईसाई पहचान उजागर की।
भारत में ऐसे बहुत से काकूरे-क्रिस्चियन हैं जो सेक्युलरवाद, वामपंथ और बौद्ध धर्म का मुखौटा पहन कर हमारे बीच हैं। भारत में ईसाई आबादी आधिकारिक रूप से 2 करोड़ है और अचंभे की बात नहीं होगी अगर भारत मे 10 करोड़ ईसाई निकलें। अकेले पंजाब में अनुमानित ईसाई आबादी 10 प्रतिशत से ऊपर है। सिखों में बड़ा वर्ग क्रिप्टो-क्रिस्चियन है। सिख धर्म के छद्मावरण में रहते हुए पगड़ी पहनते है, दाड़ी, कृपाण, कड़ा भी पहनतें हैं पर सिख धर्म को मानते हैं पर ये सभी गुप्त-ईसाई हैं। जब ये आपस में मिलते हैं तो जय-मसीह बोलते हैं।
बहुत से क्रिप्टो-क्रिस्चियन आरक्षण लेने के लिए हिन्दू नाम रखे हैं। इनमें कइयों के नाम राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि भगवानों पर होते है जिन्हें संघ के लोग भी सपने में गैर-हिन्दू नहीं समझ सकते जैसे कि विष्णु भगवान के नाम वाला पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन जिंदगी भर दलित बन के मलाई खाता रहा और जब मरने पर ईसाई धर्म के अनुसार दफनाने की प्रक्रिया देखी तो समझ में आया कि ये क्रिप्टो-क्रिस्चियन है।
देश में ऐसे बहुत से क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं जो हिन्दू नामों में हिन्दू धर्म पर हमला करके सिर्फ वेटिकन का एजेंडा बढ़ा रहे हैं। हम रोजमर्रा की ज़िंदगी में हर दिन क्रिप्टो-क्रिस्चियनों को देखते हैं पर उन्हें समझ नहीं पाते क्योंकि वे हिन्दू नामों के छद्मावरण में छुपे रहतें हैं। जैसे कि… राम को काल्पनिक बताने वाली कांग्रेसी नेता अम्बिका सोनी क्रिप्टो-क्रिस्चियन है। NDTV का अधिकतर स्टाफ क्रिप्टो-क्रिस्चियन है।
हिन्दू नामों वाले नक्सली जिन्होंने स्वामी लक्ष्मणानन्द को मारा, वे क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं। गौरी लंकेश, जो ब्राह्मणों को केरला से बाहर उठा कर फेंकने का चित्र अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लगाये थी, क्रिप्टो-क्रिस्चियन थी। JNU में भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने वाले और फिर उनके ऊपर भारत सरकार द्वारा कार्यवाही को ब्राह्मणवादी अत्याचार बताने वाले वामी नहीं, क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं। ब्राह्मणों के खिलाफ अभियान चला के हिन्दू धर्म पे हमला करने वाले सिख क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ियन पहचान में छुप कर उत्तर भारतीयों पर हमला करने वाले क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
जिस राज्य ने सबसे अधिक हिंदी गायक दिए उस राज्य बंगाल में हिंदी का विरोध करने वाले क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।अंधश्रद्धा के नाम हिन्दू त्यौहारों के खिलाफ एजेंडे चलाने वाला और बकरीद पर निर्दोष जानवरों की बलि और ईस्टर के दिन मरा हुआ आदमी जीसस जिंदा होने को अंधश्रध्दा न बोलने वाला दाभोलकर, क्रिप्टो-क्रिस्चियन था।TV पर अक्सर बौद्ध स्कॉलर बन के आने वाला काँचा इलैया, क्रिप्टो-क्रिस्चियन है, पूरा नाम है काँचा इलैया शेफर्ड।
देवी दुर्गा के वेश्या बोलने वाला JNU का प्रोफेसर केदार मंडल और रात दिन फेसबुक पर ब्राह्मणों के खिलाफ बोलने वाले दिलीप मंडल, वामन मेश्राम क्रिप्टो-क्रिस्चियन। महिषासुर को अपना पूर्वज बताने वाले जितेंद्र यादव और सुनील जनार्दन यादव जैसे कई यादव सरनेम में छुपे क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं। ब्राह्मण विरोधी वरिष्ठ राजनेता शरद यादव क्रिप्टो-क्रिस्चियन है। इसके घर पर जोशुआ प्रोजेक्ट सुनील सरदार, जॉन दयाल, चौथी राम यादव अक्सर आते हैं। NDTV पर पत्रकार के रूप में आने वाला गंजा अभय दुबे(CSDS) नाम से ब्राह्मण है पर क्रिप्टो-क्रिस्चियन है। ये भारत को अम्बेडकर के सपनों का भारत बनाना चाहता है। (स्त्रोत : दैनिक भारत)

जानिए स्वामी विवेकानंद जी का इतिहास, कैसे बने इतने महान

January 11, 2018
12 जनवरी स्वामी विवेकानन्द जयंती पर विशेष
🚩स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म 12 जनवरी सन 1863  (विद्वानों के अनुसार #मकर संक्रान्ति संवत 1920) को #कलकत्ता में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम #नरेन्द्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे।
🚩दुर्गाचरण दत्ता, (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फारसी के विद्वान थे उन्होंने अपने #परिवार को 25 वर्ष की उम्र में छोड़ दिया और साधु बन गए।
Know the history of Swami Vivekanand ji, how many great
🚩उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थी। उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेंद्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, #प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैये ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की ।
🚩बचपन से ही #नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे। अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिलने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे। उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण, रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था। संत इनके घर आते रहते थे। नियमित रूप से #भजन-कीर्तन भी होता रहता था। #परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से #बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गये। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही #ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डितजी तक चक्कर में पड़ जाते थे।
🚩स्वामी विवेकानन्द जी की शिक्षा..!!
🚩सन् 1871 में, आठ साल की उम्र में नरेंद्रनाथ ने #ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ वे स्कूल गए। 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद, वह एकमात्र छात्र थे जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये ।
🚩वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित विषयों के एक #उत्साही पाठक थे।इनकी वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी। नरेंद्र को #भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था और ये नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम में व खेलों में भाग लिया करते थे। नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टिटूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया। 1881 में इन्होंने ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की, और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली।
🚩नरेंद्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोजा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार , ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन के कामों का अध्यन किया। उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन (1861) का बंगाली में अनुवाद किया।  ये हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से काफी मोहित थे।  #पश्चिम दार्शनिकों के अध्यन के साथ ही इन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सीखा।विलियम हेस्टी (महासभा संस्था के प्रिंसिपल) ने लिखा, “नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक कि जर्मन #विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।” अनेक बार इन्हें श्रुतिधर( विलक्षण स्मृति वाला एक व्यक्ति) भी कहा गया है।
🚩स्वामी विवेकानन्द जी की आध्यात्मिक शिक्षुता – ब्रह्म समाज का प्रभाव!!
🚩1880 में नरेंद्र ईसाई से हिन्दू धर्म में रामकृष्ण के प्रभाव से परिवर्तित केशव चंद्र सेन की नव विधान में शामिल हुए, नरेंद्र 1884 से पहले कुछ बिंदु पर, एक फ्री मसोनरी लॉज और साधारण #ब्रह्म समाज जो ब्रह्म समाज का ही एक अलग गुट था और जो केशव चंद्र सेन और देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में था। 1881-1884 के दौरान ये सेन्स बैंड ऑफ़ होप में भी सक्रीय रहे जो धूम्रपान और शराब पीने से युवाओं को हतोत्साहित करता था।
🚩यह नरेंद्र के परिवेश के कारण पश्चिमी आध्यात्मिकता के साथ परिचित हो गया था। उनके प्रारंभिक विश्वासों को ब्रह्म समाज ने (जो एक निराकार ईश्वर में विश्वास और मूर्ति पूजा का प्रतिवाद करते थे) ने प्रभावित किया और सुव्यवस्थित, युक्तिसंगत, अद्वैतवादी अवधारणाओं , धर्मशास्त्र ,वेदांत और उपनिषदों के एक चयनात्मक और आधुनिक ढंग से अध्ययन पर प्रोत्साहित किया।
🚩स्वामी विवेकानन्द जी की निष्ठा..!!
🚩एक बार किसी #शिष्य ने #गुरुदेव की #सेवा में घृणा और निष्क्रियता दिखाते हुए नाक-भौं सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को क्रोध आ गया। वे अपने उस गुरु भाई को सेवा का पाठ पढ़ाते और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पी गये । #गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को समझ सके और स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। और आगे चलकर समग्र विश्व में #भारत के अमूल्य आध्यात्मिक भण्डार की महक फैला सके।
🚩ऐसी थी उनके इस #महान व्यक्तित्व की नींव में गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा जिसका परिणाम सारे संसार ने देखा।
🚩स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने #गुरुदेव #रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। उनके गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और #कुटुम्ब की नाजुक हालत व स्वयं के भोजन की चिन्ता किये बिना वे गुरु की सेवा में सतत संलग्न रहे।
🚩विवेकानन्द बड़े स्‍वप्न‍दृष्‍टा थे। #उन्‍होंने एक ऐसे समाज की कल्‍पना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद न रहे। उन्‍होंने वेदान्त के सिद्धान्तों को इसी रूप में रखा। अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धान्त का जो आधार विवेकानन्‍द ने दिया उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूँढा जा सके। #विवेकानन्‍द को युवकों से बड़ी आशाएँ थी।
आज के युवकों के लिये इस ओजस्‍वी सन्‍यासी का जीवन एक आदर्श है।
🚩स्वामी विवेकानन्द जी यात्राएँ!!
🚩25 वर्ष की अवस्था में नरेन्द्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया था । तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे #भारतवर्ष की यात्रा की। सन्‌ 1893 में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानन्द उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे। यूरोप-अमरीका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे।
🚩वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। परन्तु एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला। उस परिषद् में उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये। फिर तो अमरीका में उनका अत्यधिक स्वागत हुआ। वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया। तीन वर्ष वे #अमरीका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की। उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया।
🚩“अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा” यह स्वामी विवेकानन्द का दृढ़ विश्वास था। अमरीका में उन्होंने #रामकृष्ण मिशन की अनेक #शाखाएँ स्थापित कीं। अनेक अमरीकी विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। वे सदा अपने को ‘गरीबों का सेवक’ कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।
🚩स्वामी विवेकानन्दजी का योगदान !!
🚩39 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी #विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
🚩तीस वर्ष की आयु में स्वामी #विवेकानन्द ने #शिकागो, अमेरिका के #विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवायी।
🚩 गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-“यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।”
🚩रोमारोला ने उनके बारे में कहा था-“उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी।
🚩हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के #आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।”
🚩वे केवल सन्त ही नहीं, एक #महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने #देशवासियों को आह्वान करते हुए कहा था-“नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।” और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। #गान्धीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानन्द के आह्वान का ही फल था।
🚩इस प्रकार वे #भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं-केवल यहीं-आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।
🚩उनके कथन-“‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।”
🚩उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षोँ में विवेकानन्द लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रान्ति के जरिये भी देश को आजाद करना चाहते थे। परन्तु उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया था कि परिस्थितियाँ उन इरादों के लिये अभी परिपक्व नहीं हैं। इसके बाद ही विवेकानन्द जी ने ‘एकला चलो‘ की नीति का पालन करते हुए एक परिव्राजक के रूप में भारत और दुनिया को खंगाल डाला।
🚩उन्होंने कहा था कि #मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें।  विवेकानन्दजी पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका हिन्दू धर्म अटपटा, लिजलिजा और वायवीय नहीं था।
🚩विवेकानन्द जी इस बात से आश्वस्त थे कि #धरती की गोद में यदि ऐसा कोई देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की हैं, तो वह भारत ही है।
🚩उन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड और रूढ़ियों की खिल्ली भी उड़ायी और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विसंगतियों के खिलाफ युद्ध भी किया। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के #सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है। #स्वामीजी ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरूरत भी है लेकिन हमें याचक नहीं बनना चाहिये। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जो हम पश्चिम को दे सकते हैं और पश्चिम को उसकी बेसाख्ता जरूरत है।
🚩यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था। यह एक वेदान्ती #साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी। बीसवीं सदी के इतिहास ने बाद में उसी पर मुहर लगायी।
🚩स्वामी विवेकानन्द जी की महासमाधि!!
🚩विवेकानंद #ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि #विश्व भर में है। जीवन के अन्तिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा-“एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस #विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।” उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घण्टे ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर #महासमाधि ले ली। बेलूर में #गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अंत्येष्टि की गयी। #इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था।
🚩उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक #मन्दिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानन्द तथा उनके गुरु #रामकृष्ण के सन्देशों के प्रचार के लिये 130 से अधिक केन्द्रों की स्थापना की।
🚩स्वामी विवेकानन्द जी की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ!!
🚩12 जनवरी 1863 — कलकत्ता में जन्म
🚩1879 — प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता में प्रवेश
🚩1880 — जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश
🚩नवंबर 1881 — रामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट
🚩1882-86 — रामकृष्ण परमहंस से सम्बद्ध
🚩1884 — स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास
🚩1885 — रामकृष्ण परमहंस की अन्तिम बीमारी
🚩16 अगस्त 1886 — रामकृष्ण परमहंस का निधन
🚩1886 — वराहनगर मठ की स्थापना
🚩जनवरी 1887 — वराह नगर मठ में संन्यास की औपचारिक प्रतिज्ञा
🚩1890-93 — परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण
🚩25 दिसम्बर 1892 — कन्याकुमारी में
🚩13 फ़रवरी 1893 — प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकन्दराबाद में
🚩31 मई 1893 — मुम्बई से अमरीका रवाना
🚩25 जुलाई 1893 — वैंकूवर, कनाडा पहुँचे
🚩30 जुलाई 1893 — शिकागो आगमन
🚩अगस्त 1893 — हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो॰ जॉन राइट से भेंट
🚩11 सितम्बर 1893 — विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान
🚩27 सितम्बर 1893 — विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अन्तिम व्याख्यान
🚩16 मई 1894 — हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण
🚩नवंबर 1894 — न्यूयॉर्क में वेदान्त समिति की स्थापना
🚩जनवरी 1895 — न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरम्भ
🚩अगस्त 1895 — पेरिस में
🚩अक्टूबर 1895 — लन्दन में व्याख्यान
🚩6 दिसम्बर 1895 — वापस न्यूयॉर्क
🚩22-25 मार्च 1896 — फिर लन्दन
🚩मई-जुलाई 1896 — हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान
🚩15 अप्रैल 1896 — वापस लन्दन
🚩मई-जुलाई 1896 — लंदन में धार्मिक कक्षाएँ
🚩28 मई 1896 — ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट
🚩30 दिसम्बर 1896 — नेपाल से भारत की ओर रवाना
🚩15 जनवरी 1897 — कोलम्बो, श्रीलंका आगमन
🚩जनवरी, 1897 — रामनाथपुरम् (रामेश्वरम) में जोरदार स्वागत एवं भाषण
🚩6-15 फ़रवरी 1897 — मद्रास में
🚩19 फ़रवरी 1897 — कलकत्ता आगमन
🚩1 मई 1897 — रामकृष्ण मिशन की स्थापना
🚩मई-दिसम्बर 1897 — उत्तर भारत की यात्रा
🚩जनवरी 1898 — कलकत्ता वापसी
🚩19 मार्च 1899 — मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना
🚩20 जून 1899 — पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा
🚩31 जुलाई 1899 — न्यूयॉर्क आगमन
🚩22 फरवरी 1900 — सैन फ्रांसिस्को में वेदान्त समिति की स्थापना
🚩जून 1900 — न्यूयॉर्क में अन्तिम कक्षा
🚩26 जुलाई 1900 — यूरोप रवाना
🚩24 अक्टूबर 1900 — विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा
🚩26 नवम्बर 1900 — भारत रवाना
🚩9 दिसम्बर 1900 — बेलूर मठ आगमन
🚩10 जनवरी 1901 — मायावती की यात्रा
🚩मार्च-मई 1901 — पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्रा
🚩जनवरी-फरवरी 1902 — बोध गया और वाराणसी की यात्रा
🚩मार्च 1902 — बेलूर मठ में वापसी
🚩4 जुलाई 1902 — महासमाधि!!
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